देश में त्योहारों, मौसम की खराबी या ऐन वक्त पर सफर करने वाले हवाई यात्रियों की जेब पर अत्यधिक बोझ डालने वाले ‘अनियंत्रित हवाई किरायों’ के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत में एक निर्णायक सुनवाई होने जा रही है।
निजी एयरलाइंस द्वारा वसूले जा रहे मनमाने किराये और अन्य हिडन चार्ज (अतिरिक्त शुल्कों) पर नियंत्रण के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार (13 जुलाई) को सुनवाई करेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर इस याचिका पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ सुनवाई करेगी, जिसमें विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और यात्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत व स्वतंत्र नियामक बनाने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट इस गंभीर मुद्दे पर पहले भी सख्त रुख अपना चुका है। पिछली सुनवाइयों में कोर्ट ने त्योहारों के दौरान किरायों में होने वाली बेतहाशा बढ़ोतरी को “शोषण” करार दिया था। 15 मई को इसने स्पष्ट रूप से कहा था कि किरायों में कुछ तर्कसंगतता होनी चाहिए।
कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि एक ही दिन, एक ही रूट पर अलग-अलग एयरलाइंस मनमाना और अलग-अलग किराया वसूलती हैं, जिससे यात्रियों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।
याचिका में एयरलाइंस की उस नीति पर भी तीखा प्रहार किया गया है, जिसके तहत बिना किसी ठोस वजह के इकानमी क्लास के यात्रियों के लिए मुफ्त चेक-इन सामान की सीमा 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दी गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि एयरलाइंस ने मुफ्त सेवा को जबरन कमाई के नए जरिये में बदल दिया है।
“फिलहाल किसी भी अथारिटी के पास हवाई किरायों या अतिरिक्त शुल्कों की समीक्षा करने या उन पर कैप (सीमा) लगाने की शक्ति नहीं है। यह नियामक शून्यता सीधे तौर पर नागरिकों के समानता और सम्मान से जीने के मौलिक अधिकारों का हनन करती है।”
इस मामले में केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया है कि नया कानून ‘भारतीय वायुयान अधिनियम 2024’ जनवरी 2025 से प्रभावी हो चुका है और इसके नियमों को लेकर विचार-विमर्श जारी है। अब देखना यह है कि 13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट आम जनता को इससे कितनी राहत दिला पाता है।