सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक न्यायिक अधिकारी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा की गई कठोर टिप्पणियों के खिलाफ अपील की गई थी।
हाई कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को विवाह कानूनों में रिफ्रेशर-ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेने का निर्देश दिया था।
पिछले वर्ष नवंबर में हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के न्यायिक अधिकारी के विवाह संबंधी मामलों के निपटारे के तरीके पर अपनी कड़ी असहमति जताई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारी को दिल्ली न्यायिक अकादमी के अधीन एक उपयुक्त रिफ्रेशर-ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेना चाहिए इससे पहले कि वह आगे कोई विवाह संबंधी मामलों का निपटारा करें।
याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष हुई। पीठ ने न्यायिक अधिकारी के वकील से पूछा -”उन्होंने ये कठोर टिप्पणियां क्यों कीं।”
पीठ ने कहा- ”वह (न्यायिक अधिकारी) जिला न्यायाधीश के रूप में अनुच्छेद 142 के अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं।”
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी भी आदेश या निर्णय को पारित करने का अधिकार देता है जो पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि ऐसी कठोर टिप्पणियां बिना संबंधित व्यक्ति को सुने नहीं दी जानी चाहिए।
पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी किया और इसे चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। जब याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क किया कि हाई कोर्ट का आदेश स्थगित किया जाना चाहिए तो पीठ ने कहा, ”हम नोटिस जारी कर रहे हैं। आप और क्या चाहते हैं?” पीठ ने कहा, ”यदि हम सहमत होंगे तो हम टिप्पणियां हटाएंगे।”