होर्मुज संकट का असर: आम आदमी की जेब पर दोहरी मार, रोजमर्रा की चीजें हो सकती हैं महंगी…

पश्चिम एशिया के वर्तमान भू-राजनीतिक हालात और हॉर्मुज जलमार्ग के बंद होने की आशंकाओं ने केवल पेट्रोल और डीजल के दामों में ही वृद्धि नहीं की है, बल्कि एक बड़ा संकट पेट्रोकेमिकल्स की कीमतों को लेकर भी खड़ा कर दिया है।

आम जनता की जेब पर जल्द ही एक बड़ा बोझ बढ़ने वाला है। यह संकट केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा असर अब हर घर की रसोई और बाथरूम तक पहुंचने की आशंका है।

जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में उछाल आता है, तो पेट्रोकेमिकल्स भी सीधे तौर पर महंगे हो जाते हैं। इसका सीधा और विपरीत प्रभाव आम आदमी के मासिक राशन और घरेलू खर्चों पर पड़ना तय माना जा रहा है।

रसोई से लेकर सफाई तक की चीजों पर प्रभाव

इक्रा और एसबीआई रिसर्च के अनुसार, इस महंगाई का असर हर घर की दिनचर्या को प्रभावित करेगा। साबुन, कपड़े धोने के डिटर्जेंट और घर की साफ-सफाई में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर उत्पाद पेट्रोकेमिकल से तैयार कच्चे माल पर ही अत्यधिक निर्भर होते हैं।

इसके अलावा, प्लास्टिक से बनने वाले दैनिक उपयोग के सामान जैसे बाल्टियां, पानी की बोतलें और किचन के कंटेनरों की उत्पादन लागत में भी भारी इजाफा होगा।

पैकेटबंद खाद्य पदार्थों जैसे कि बिस्कुट, खाने के तेल और नूडल्स बनाने वाली कंपनियों पर इस स्थिति का दोहरा असर देखने को मिलेगा। एक तरफ पैकेजिंग सामग्री महंगी होगी, तो दूसरी तरफ महंगे ईंधन के कारण माल ढुलाई यानी ट्रांसपोर्ट का खर्च भी बढ़ जाएगा।

हालांकि, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर इसका तुरंत कोई असर दिखाई नहीं देगा, लेकिन लॉजिस्टिक्स और शिपिंग की लागत में लगातार होने वाली वृद्धि के कारण भविष्य में आयातित गैजेट्स के दाम भी आसमान छू सकते हैं।

भारत के लिए 88 प्रतिशत आयात का बड़ा जोखिम

इस पूरे वैश्विक घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय कच्चे तेल को लेकर दूसरे देशों पर भारी निर्भरता है। भारत अपनी कुल खपत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जो ऐसे संकट के समय में एक बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम बन जाता है।

हालांकि, मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए भारत के पास रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देशों से तेल मंगाने के वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं और आपात स्थिति के लिए देश का अपना रणनीतिक भंडार भी है। लेकिन समस्या यह है कि यदि यह अंतरराष्ट्रीय तनाव शांत नहीं होता है और कई महीनों तक खिंच जाता है, तो यह सुरक्षित भंडार भी नाकाफी साबित हो सकता है।

कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने और महंगी होने से उद्योगों में उत्पादन कम होगा, जिसके परिणामस्वरूप पूरे देश में महंगाई की एक नई और लंबी लहर आ सकती है।

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