भारत से रिश्तों में खटास का असर दिखने लगा, रिपोर्ट कार्ड में पिछड़ी बालेन शाह सरकार…

नेपाल की नई सरकार, जो युवा आंदोलन के जोर पर सत्ता तक पहुंची थी, महज दो महीनों में ही विश्वसनीयता खोने लगी है।

भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ जन-विद्रोह के नायक बालेन्द्र शाह (बालेन) अब अपनी सरकार की खराब रिपोर्ट कार्ड पर सवालों के घेरे में हैं।

27 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले बालेन के 100 सूत्री एजेंडे के ज्यादातर वादे अभी तक कागजों तक सीमित दिख रहे हैं।

भारत से संबंधों में तनाव

सरकार बनने के महज 30 दिनों के अंदर भारतीय सामानों पर 5 से 80 प्रतिशत तक टैक्स लगाए गए। 100 नेपाली रुपए से महंगे सामान, दवाइयां और खाद्य पदार्थ इसकी जद में आए। व्यापारियों और आम नागरिकों ने इसे ‘अघोषित नाकाबंदी’ करार दिया और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

लिपुलेख विवाद भी संबंधों को खराब कर रहा है। भारत और चीन के मानसरोवर यात्रा शुरू करने के फैसले पर नेपाल ने तीखी आपत्ति जताई थी। शाह सरकार 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपना क्षेत्र बताती है।

वादे अधर में, जवाबदेही की कमी

चुनाव के दौरान सीमित भाषण देने वाले बालेन प्रधानमंत्री बनने के बाद न राष्ट्र को संबोधित कर सके और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान वे अचानक सदन से बाहर चले गए। संसद सत्रों में बिना सूचना गायब रहने के आरोप भी लग रहे हैं।

‘गवर्नमेंट ट्रैकर’ वेबसाइट के अनुसार उनके अधिकांश सुधार वादे ठंडे बस्ते में हैं। युवा वोटर, जो बदलाव की उम्मीद में सड़कों पर उतरे थे, अब नई सरकार से मोहभंग महसूस कर रहे हैं।

कैबिनेट में उथल-पुथल

सरकार को शुरुआत में ही दो अहम मंत्रियों को हटना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह अपनी पत्नी की अनुचित नियुक्ति के मामले में बर्खास्त हो गए, जबकि गृह मंत्री सूदन गुरुंग को कारोबारी से संबंधों के चलते इस्तीफा देना पड़ा। युवा अब खुलकर सवाल कर रहे हैं कि क्या नई राजनीति में सक्षम चेहरों की कमी है?

बुलडोजर एक्शन से भड़के लोग 

सरकार ने छात्र संगठनों और कर्मचारी यूनियनों पर पाबंदी लगाने के लिए आठ अध्यादेश जारी किए, लेकिन नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने सभी पर तुरंत रोक लगा दी।

काठमांडू घाटी में बिना चेतावनी या पुनर्वास योजना के करीब 4,000 झुग्गी-झोपड़ियां गिरा दी गईं, जिससे 15,000 से ज्यादा गरीब लोग बेघर हो गए।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। लोगों ने इसे ‘बुलडोजर आतंक’ बताते हुए बालेन के खिलाफ प्रदर्शन तेज कर दिए।

ओली मामले में पछतावा

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी को लेकर भी सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है। विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रहा है।

दो महीने पूरे होते-होते बालेन सरकार की लोकप्रियता में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है। जो सरकार युवा क्रांति पर सवार होकर आई थी, वही अब युवाओं के आक्रोश का सामना कर रही है।

बालेन अपनी छवि सुधार पाते हैं या मोहभंग स्थायी हो जाता है, यह आने वाले समय में तय होगा।

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