‘2047 तक विकसित भारत का सपना अधूरा रह सकता है’, UAPA के व्यापक इस्तेमाल पर जस्टिस भुइयां ने जताई चिंता…

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के अत्यधिक इस्तेमाल पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

उन्होंने कहा कि असहमति को अपराध बनाकर, यूएपीए के तहत बिना सोचे-समझे गिरफ्तारियां करके और गहरी सामाजिक दरारों के जरिये 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

यहां सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक सच्चे विकसित राष्ट्र को राजनीतिक नारों के बजाय संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आतंकरोधी कानून यूएपीए के तहत कम दोषसिद्धि की दर दिखाती है कि इस कानून का अगर दुरुपयोग नहीं हो रहा, तो अधिक इस्तेमाल तो हो ही रहा है।

यूएपीए के तहत गिरफ्तार लोगों के 2019 से 2023 तक के आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने कहा कि हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन दोषसिद्धि दर लगभग पांच प्रतिशत ही है।

इससे अदालतों पर कितना बोझ पड़ता है? यह दिखाता है कि अधिकतर लोगों को गिरफ्तार तो कर लिया गया, लेकिन उन्हें दोषी साबित नहीं किया जा सका। उनके विरुद्ध पर्याप्त सुबूत नहीं थे।”

असहमति और बहस को नहीं माना जाना चाहिए अपराध

जस्टिस भुइयां ने कहा, ”मेरे विकसित भारत माडल में धन का समान वितरण और घोर असमानता का खात्मा शामिल है.. जो संविधान में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में भी एक लक्ष्य के तौर पर तय किया गया है।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि विकसित भारत में न्यायपालिका को न्यायपालिका ही रहना चाहिए और वह हमेशा आलोचना करने वाली या हमेशा प्रशंसा करने वाली संस्था नहीं बन सकती। उन्होंने कहा कि विकसित देशों में बहस और असहमति के लिए अधिक गुंजाइश होनी चाहिए। बहस को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। अलग-अलग विचारों और आलोचना के प्रति अधिक सहनशीलता होनी चाहिए। अलग-अलग विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

हर व्यक्ति के सम्मान की होनी चाहिए रक्षा

सामाजिक असंतुलन पर उन्होंने कहा कि समाज में गहरी दरारें मौजूद हैं। विकसित भारत ऐसी दरारों को सहन नहीं कर सकता। माता-पिता इस बात की जिद नहीं कर सकते कि उनके बच्चे दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे। यह विकसित भारत का माडल नहीं हो सकता।

हम विकसित भारत तब तक नहीं बन सकते, जब तक दलित लोगों को गलियारे में खड़ा किया जाएगा और लोग उन पर पेशाब करेंगे। हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की जानी चाहिए।

दोबारा सिफारिश के बाद भी नहीं होती नियुक्ति : जस्टिस गवई

पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि ऐसे कई फैसले आए हैं, जिनमें कहा गया है कि अगर सरकार हाई कोर्ट में जज के पद के लिए किसी व्यक्ति के नाम की सिफारिश पुनर्विचार के लिए वापस भेजती है और कोलेजियम उस नाम की दोबारा सिफारिश करता है, तो सरकार के पास उस व्यक्ति को नियुक्त करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। लेकिन ऐसे कई मामले हैं जिनमें नाम की दोबारा सिफारिश के बावजूद उन व्यक्तियों को नियुक्त नहीं किया गया।

उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर जताया अफसोस

जस्टिस भुइयां ने उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर भी अफसोस जताया। उन्होंने कहा कि देशभर की जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के पदों पर 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं पहुंचती हैं, लेकिन क्या संवैधानिक अदालतों में भी ऐसा ही है? यहीं पर कोलेजियम प्रणाली की जरूरत है। ऐसा क्यों है कि जब मूल्यांकन व्यक्तिपरक हो जाता है, तो महिलाएं उस स्तर तक नहीं पहुंच पातीं?

1950 से अब तक सुप्रीम कोर्ट के 287 जजों में से सिर्फ 11 महिला जज रही हैं। फातिमा बीवी से शुरू करके अब जस्टिस बीवी नागरत्ना तक यह आंकड़ा लगभग दो प्रतिशत ही है।

हाई कोर्ट के महिला जजों की संख्या सिर्फ 14 प्रतिशत है। 25 हाई कोर्टों में सिर्फ गुजरात और मेघालय में महिला मुख्य न्यायाधीश हैं। एक और महिला जज एक माह में मुख्य न्यायाधीश बन जाएंगी। यह भी बहुत कम है, 25 हाई कोर्टों में से सिर्फ तीन। जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को एक इंद्रधनुषी संस्था होना चाहिए, जो सही मायने में देश की विविधता को दर्शाए।

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