सुपर अल-नीनो की दस्तक से बढ़ी मौसम विशेषज्ञों की चिंता, जानिए भारत के लिए कितना बड़ा खतरा…

देश में इस समय भयंकर गर्मी पड़ रही है। मानसून अभी दक्षिण-पश्चिम तक पहुंच गया है। वहीं उत्तर भारत के लोगों को अभी भी मानसून का इंतजार है। भयंकर गर्मी से परेशान लोग बारिश की आस में हैं।

मानसून के आने की उम्मीद के साथ ही एक ऐसा संकट प्रशांत महासागर में आ गया है, जो आने वाले समय में संकट पैदा कर सकता है। इस संकट का नाम है- अल नीनो।

देश पर ‘सुपर अल-नीनो’ का खतरा

मौसम के एक नए अनुमान में एक चिंताजनक बात सामने आई है। प्रशांत महासागर में बन रहा ‘अल नीनो’ अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो हो सकता है। इसे फिल्मों से लिया गया एक निकनेम भी दिया गया है- ‘गॉडजिला अल नीनो’।

अल नीनो के बारे में सटीक जानकारी पाना मुश्किल है। प्रशांत महासागर में यह पानी का वह हिस्सा है, जिस पर वैज्ञानिक सबसे ज्यादा नजर रखते हैं। जिस तापमान पर अल-नीनो बनता है, यहां का पानी उस तापमान से भी ऊपर जा चुका है।

यूरोपीय मौसम विशेषज्ञों को उम्मीद है कि प्रशांत महासागर के पानी का तापमान अभी और बढ़ेगा। ग्लोबल क्लाइमेट एजेंसियों ने अब आधिकारिक तौर पर अल नीनो की शुरुआत की घोषणा कर दी है। आशंका जताई जा रही है कि सितंबर तक इसके हालात और मजबूत हो जाएंगे।

क्या है अल-नीनो?

अल नीनो, ‘अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन’ (ENSO) नाम के एक विशाल क्लाइमेट सी-सॉ (उतार-चढ़ाव वाले चक्र) का एक हिस्सा है। ट्रॉपिकल पैसिफिक (उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र) को इस बात से समझें कि एक तरफ गर्म चरण है – अल नीनो। दूसरी तरफ ठंडा चरण है – ला नीना।

आमतौर पर, ‘ट्रेड विंड्स’ नाम की स्थिर हवाएं प्रशांत महासागर की सतह के गर्म पानी को एशिया की ओर धकेलती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान, ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी वापस से पूर्व की ओर खिसक जाता है और महासागर अपनी गर्मी जमा करने की जगह बदल लेता है।

खतरे के निशान से पार गया तापमान

वैज्ञानिक मध्य प्रशांत महासागर के एक हिस्से पर नजर रखते हैं जिसे ‘नीनो 3.4 क्षेत्र’ कहा जाता है। यहां का तापमान सामान्य से लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच चुका है, जो 0.5 डिग्री के उस निशान को पार कर गया है जो अल नीनो का संकेत देता है।

संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी, ‘वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन’ ने आधिकारिक तौर पर अल नीनो की शुरुआत की पुष्टि की है। एजेंसी का अनुमान है कि 2026 के बाकी समय में इसके और मजबूत होने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत है, क्योंकि गर्मी बढ़ने का सिलसिला जारी रहेगा।

‘यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट’ का अनुमान है कि दिसंबर तक ‘नीनो 3.4’ इलाका सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो जाएगा। वहीं कुछ एजेंसी का मानना है कि यह 4 डिग्री तक भी पहुंच सकता है।

भारत के लिए अल-नीनो का क्या है मतलब?

भारत के लिए अल नीनो का मतलब कमजोर मानसून है। इसकी वजह समुद्र के ऊपर की हवा है। जब प्रशांत महासागर गर्म होता है तो ऊपर उठने वाली हवा और भारी बारिश का जो घेरा इस इलाके को नमी देता है, वह अल-नीनो की वजह से भारत से दूर पूरब की ओर खिसक जाता है, जिससे मानसून की हवाओं की ताकत कम हो जाती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी इस बार बारिश के मौसम में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है। यह अनुमान ‘लॉन्ग पीरियड एवरेज’ (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत है। यह पैमाना 1971 से 2020 के बीच 50 सालों की बारिश के आंकड़ों के आधार पर तय किया गया है।

भारत पर पड़ सकता है असर

भारत के लिए मानसून सिर्फ एक मौसम नहीं है। भारत में सालाना बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इसी से मिलता है और देश की आधे से ज्यादा खेती वाली जमीन सिंचाई के लिए बारिश पर ही निर्भर है।

पिछली बार जब 2015-2016 में जबरदस्त अल नीनो आया था, तो भारत में औसत बारिश का सिर्फ 86 प्रतिशत ही हुआ था और देश सूखे की चपेट में आ गया था।

देश के करीब 60 प्रतिशत किसान अपनी गर्मियों की फसलों के लिए इसी बारिश पर निर्भर हैं। कमजोर मानसून का असर सबसे पहले मिट्टी पर और उसके तुरंत बाद खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दिखता है।

देश में आज भी खाने-पीने की चीजों की कीमत बारिश से तय होती है। बारिश बेहतर होगी तो फसलों को सही मात्रा में पानी मिलेगा और देश में खाने-पीने की चीजें सही मात्रा में उपलब्ध हो सकेंगी।

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