पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है ऋतब्रत बनर्जी। कभी सीपीएम के उभरते युवा चेहरे माने जाने वाले ऋतब्रत आज राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता बन चुके हैं।
यह बदलाव इतना अचानक और नाटकीय रहा कि बंगाल की राजनीति में इसे ;सबसे बड़ा राजनीतिक तख्तापलट’ कहा जा रहा है। कुछ महीने पहले तक ऋतब्रत बनर्जी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर एक तेज-तर्रार लेकिन सीमित प्रभाव वाले नेता माने जाते थे। लेकिन अब वह बंगाल की सत्ता और विपक्ष दोनों समीकरणों के केंद्र में आ गए हैं।
वायरल वीडियो से राजनीतिक भूचाल तक
विधानसभा चुनाव से पहले एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। उसमें टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ऋतब्रत को बीच भाषण में रोकते हुए दिखाई दी थीं। ऋतब्रत जोशीले अंदाज में लंबा भाषण दे रहे थे, तभी ममता ने उन्हें टोकते हुए कहा कि मुद्दे पर बात करें।
उस समय इस वीडियो को लोगों ने मजाकिया अंदाज में लिया था, लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वही नेता कुछ समय बाद बंगाल की राजनीति के सबसे बड़े शक्ति केंद्रों में शामिल हो जाएगा।
कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी?
ऋतब्रत बनर्जी दक्षिण कोलकाता के जादवपुर इलाके के मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनका परिवार पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से पश्चिम बंगाल आया था। उन्होंने साउथ प्वाइंट स्कूल से पढ़ाई की है साथ ही आशुतोष कॉलेज से अंग्रेजी ऑनर्स किया। इसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में मास्टर्स डिग्री हासिल की।
छात्र जीवन से ही वे वामपंथी राजनीति से जुड़ गए थे और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) में सक्रिय रहे। कांग्रेस नेता और पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आशुतोष चटर्जी याद करते हैं कि कॉलेज राजनीति के दौर में भी ऋतब्रत अपने धारदार भाषणों के लिए मशहूर थे।
वामपंथ का ‘ब्लू-आइड बॉय’
ऋतब्रत बनर्जी को कभी पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का करीबी माना जाता था। कम उम्र में ही उन्होंने पार्टी नेतृत्व का भरोसा जीत लिया था। सिर्फ 34 वर्ष की उम्र में 2014 में उन्हें सीपीएम ने राज्यसभा भेज दिया। यह उस पार्टी के लिए असाधारण फैसला था, जो आमतौर पर लंबे संगठनात्मक संघर्ष के बाद ही नेताओं को ऊपर लाती है।
राज्यसभा में प्रभावशाली रिकॉर्ड
संसद में ऋतब्रत का प्रदर्शन काफी सक्रिय रहा। PRS के अनुसार उनके नाम 823 सवाल, 275 बहस/हस्तक्षेप और 77% उपस्थिति दर्ज है। सीपीएम में रहते हुए उन्होंने किसानों, मजदूरों, सार्वजनिक संस्थानों और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे मुद्दे उठाए। बाद में टीएमसी में आने के बाद उनके भाषणों में बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, संघीय ढांचे और केंद्र के साथ टकराव जैसे मुद्दे प्रमुख हो गए।
सीपीएम से क्यों टूटा रिश्ता?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक ऋतब्रत की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत पहचान बनाने की इच्छा थी। लेकिन सीपीएम जैसी अनुशासित पार्टी में यह शैली कई नेताओं को पसंद नहीं आई।
उनका पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम से लगातार टकराव होता रहा। अंततः अनुशासनहीनता और ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आरोपों के बाद उन्हें सीपीएम से बाहर कर दिया गया। हालांकि ऋतब्रत ने हमेशा इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया।
विवादों और गिरावट का दौर
सीपीएम से निकाले जाने के बाद ऋतब्रत के राजनीतिक करियर पर गंभीर संकट आ गया। उन पर निजी जीवन और कथित यौन शोषण से जुड़े आरोप लगे।
कुछ तस्वीरें भी वायरल हुईं, जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उस समय ऋतब्रत को अपनी नई राजनीतिक पहचान गढ़नी पड़ी।
टीएमसी में दूसरी पारी
ऋतब्रत ने तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर अपने राजनीतिक पुनर्जन्म की शुरुआत की। उन्होंने खास तौर पर उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में काम किया, जहां परंपरागत रूप से वामपंथ का प्रभाव रहा है।
उन्होंने अपने पुराने वामपंथी संपर्कों का इस्तेमाल कर कई मजदूर नेताओं को टीएमसी के ट्रेड यूनियन संगठन INTTUC से जोड़ा। धीरे-धीरे वे टीएमसी नेतृत्व, खासकर अभिषेक बनर्जी, के करीबी बन गए।
जब उन्हें 2024 में राज्यसभा भेजा गया, तब अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर उनकी मेहनत और संगठन क्षमता की खुलकर तारीफ की थी।
ममता को देखकर समझा लेनिन
ऋतब्रत ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने ममता बनर्जी को देखकर लेनिन की राजनीति को समझा। यह बयान उस समय काफी चर्चित हुआ था और इसे टीएमसी नेतृत्व के प्रति उनकी निष्ठा के संकेत के रूप में देखा गया।
आखिर क्यों चुने गए विपक्ष के नेता?
राजनीतिक विश्लेषक शुभमोय मैत्रा के मुताबिक ऋतब्रत बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘राजनीतिक बहुरूपता’ है। उनके पास वामपंथी पृष्ठभूमि, बंगाली बौद्धिक छवि, मजबूत वक्तृत्व कला, मजदूर राजनीति का अनुभव और सार्वजनिक रूप से भाजपा विरोधी पहचान मौजूद है।
‘एकनाथ शिंदे मॉडल’ की चर्चा
कांग्रेस नेता आशुतोष चटर्जी का दावा है कि बंगाल में जो हो रहा है, वह महाराष्ट्र के ‘एकनाथ शिंदे मॉडल’ जैसा है। उनके मुताबिक यह सिर्फ विपक्षी पुनर्गठन नहीं, बल्कि सत्ता समीकरण बदलने की कोशिश है। उन्होंने इसे ‘डबल-O राजनीति’ कहा, यानी ‘ऑपरच्युनिस्ट ऑपोजिशन’।
सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात ने बढ़ाई अटकलें
राजनीतिक हलकों में उस समय चर्चाएं और तेज हो गईं जब दिल्ली में ऋतब्रत बनर्जी और भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी की मुलाकात सामने आई। हालांकि इसे ‘संयोग’ बताया गया, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत हो सकता है।
मुस्लिम विधायकों का समर्थन कैसे मिला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इस राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे भाजपा की रणनीति है, तो फिर कई मुस्लिम विधायक ऋतब्रत के साथ कैसे आ गए?
सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम का कहना है कि भाजपा सीधे मुस्लिम चेहरों को आगे नहीं करती, बल्कि सहयोगी ताकतों का इस्तेमाल करती है।
दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि टीएमसी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि ने इस बगावत को जन्म दिया।
टीएमसी के लिए अस्तित्व का संकट?
टीएमसी के निलंबित प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह सिर्फ “धुरंधर-1” है और आगे “धुरंधर-2” भी होगा। उनका संकेत पार्टी के भीतर और बड़े राजनीतिक पुनर्गठन की ओर माना जा रहा है।
क्या ऋतब्रत बना पाएंगे स्थायी राजनीतिक ताकत?
फिलहाल बंगाल की राजनीति का केंद्र ऋतब्रत बनर्जी बन चुके हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक क्षण है या लंबी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत? इतिहास गवाह है कि बंगाल की राजनीति में कई नेता अचानक उभरे और उतनी ही तेजी से गायब भी हो गए।