पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक क्रूड बाजार में जिस तरह से आग लगाई है, उससे अभी तक तो आम जनता को बचा कर रखा गया है लेकिन अब ज्यादा दिनों तक यह संभव नहीं दिख रहा।
वजह यह है कि सरकार की तरफ से तमाम उपायों के बावजूद सरकारी क्षेत्र की तीनों तेल कंपनियों (इंडियन आयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम) के लिए अब पेट्रो उत्पादों की बिक्री में होने वाले घाटा को सहना मुश्किल हो गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय का आकलन है कि सिर्फ मार्च व अप्रैल के बीच उक्त तीनों कंपनियों को संयुक्त तौर पर 30 हजार करोड़ रुपये का घाटा हो गया है। अगर केंद्र सरकार ने उन्हें उत्पाद शुल्क में कटौती करके मदद नहीं की होती तो यह घाटा 62,500 करोड़ रुपये का हो गया होता।
केंद्र सरकार को राजस्व का नुकसान
पेट्रोलियम मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि जब कच्चे तेल की कीमत 120 डालर प्रति बैरल को पार गई थी तब पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 24 रुपये और डीजल पर लगभग 30 रुपये का बोझ उठाया था। केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क को 13 रुपये से घटकर 3 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये से शून्य करके हानि को कम करने में मदद की है लेकिन इससे केंद्र सरकार को भी राजस्व का नुकसान भी हुआ है।
पश्चिम एशिया संघर्ष अब ग्यारहवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और मौजूदा व्यवस्था अनिश्चितकाल तक नहीं चलाई जा सकती। वैसे भी दुनिया के बाकी देशों की तुलना में भारतीय ग्राहक अभी तक पेट्रो महंगाई से सुरक्षित रखे गये हैं।
भारत में स्थिर है दाम
इस दौरान हांगकांग में पेट्रोल कीमत 25 फीसद, सिंगापुर में 30 फीसद, इटली-जर्मनी-फ्रांस जैसे देशों में 35-30 फीसद की वृद्धि की गई है। जबकि भारत में पेट्रोल अभी भी लगभग 95-96 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर है।
कई छोटे देशों ने और भी सख्त कदम उठाए जैसे बांग्लादेश ने ईंधन राशनिंग लागू की, श्रीलंका ने चार दिवसीय कार्य सप्ताह, फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित किया, पाकिस्तान और ताइवान में भी प्रतिबंध लगाए गए।
अगर नहीं बढ़ी कीमतें तो क्या होगा असर?
अधिकारी यह भी बताते हैं कि अगर खुदरा कीमतों को बढ़ा कर पेट्रोलियम व्यवसाय को व्यवस्थित नहीं किया गया तो भारत में पेट्रोलियम उत्पादों का रणनीतिक भंडार बनाने, देश भर में गैस पाइलपाइन बिछाने, रिफाइनरियों की क्षमता बढ़ाने जैसी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
भारत का वर्तमान स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मात्र 53.3 लाख टन है, जो करीब 15 दिन के आयात के बराबर है। एलपीजी के लिए 30 दिन का समर्पित रिजर्व बनाने की योजना है। पश्चिम एशिया संकट के बाद इन योजनाओं पर तेजी से काम करने की जरूरत है। रिफाइनरियां अपनी क्षमता यानी 100 फीसद से ज्यादा पर काम कर रही हैं जिसे ज्यादा दिनों तक बना कर रखना संभव नहीं है।