दुर्ग का थनौद गांव: 5 हजार दुर्गा प्रतिमाएं बनीं, वेश्यालय की मिट्टी लाने की परंपरा; इसके बिना नहीं होती प्राण-प्रतिष्ठा…

दुर्ग जिले का थनौद गांव नवरात्रि के दौरान आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। जिला मुख्यालय से 11 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव अपनी मिट्टी शिल्प कला के लिए देशभर में जाना जाता है।

यहां हर साल 5 हजार से अधिक मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, जो विशेष मिट्टी से बनती हैं और पूरे देश में भेजी जाती हैं।

लगभग 10 हजार की आबादी वाले थनौद में 70 कुम्हार परिवार हैं। इनमें से 60 परिवार पीढ़ियों से प्रतिमा निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं।

इन प्रतिमाओं की मांग न केवल छत्तीसगढ़ में है, बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों तक भी इनकी आपूर्ति की जाती है।

थनौद की प्रतिमाओं की एक प्रमुख विशेषता वह विशेष मिट्टी है, जिसे कारीगर परंपरागत रूप से वेश्यालय से लाते हैं। आखिर इसके पीछे की वजह क्या है पढ़िए…

50 हजार रुपए से लेकर 2 लाख तक होती है कीमत

इन प्रतिमाओं के निर्माण में लगने वाली मेहनत और कला का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनकी कीमत 50 हजार रुपए से लेकर 2 लाख रुपए तक होती है। बाहरी राज्यों में इन मूर्तियों को और भी अधिक दामों पर खरीदा जाता है।

गांव के कारीगर राधेश्याम, जो मूर्तिकला की चौथी पीढ़ी से संबंध रखते हैं, बताते हैं कि यह ज्ञान उन्हें अपने पूर्वजों से मिला है। उनके बेटे भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए प्रतिमा बनाना केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का प्रतीक है।

वेश्यालय से लाते है मिट्टी

थनौद की प्रतिमाओं की एक प्रमुख विशेषता वह विशेष मिट्टी है, जिसे कारीगर परंपरागत रूप से वेश्यालय से लाते हैं।

ऐसी मान्यता है कि इस मिट्टी के बिना प्रतिमा अधूरी रहती है और इसी मिट्टी से बनी प्रतिमाओं में ही प्राण-प्रतिष्ठा संभव है।

श्रद्धालु भी मानते हैं कि माता रानी इस परंपरा को स्वीकार करती हैं, जिससे पूजा तभी पूर्ण होती है जब इस मिट्टी का प्रयोग किया जाए।

नवरात्रि से पहले जैसे ही प्रतिमाओं की मांग बढ़ती है, गांव की गलियां रंगों की बौछार, मिट्टी की सुगंध और हथौड़े की थाप से गूंज उठती हैं। हर घर में मूर्तियां बनती दिखाई देती हैं।

कारीगर सुबह से देर रात तक काम करते हैं ताकि सभी प्रतिमाएं समय पर तैयार हो सकें।

बढ़ती लागत और परिवहन खर्च चुनौती

थनौद के कारीगर बताते हैं कि लगातार बढ़ती लागत और परिवहन खर्च उनके सामने चुनौती है, लेकिन इसके बावजूद वे इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज थनौद की प्रतिमाएं देशभर में भक्ति और आस्था का प्रतीक बन चुकी हैं।

यह गांव सिर्फ मूर्तियां नहीं बनाता, बल्कि हर साल हजारों श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और परंपरा की नई परिभाषा गढ़ता है।

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