ये हैं खांटी बिहारी मिठाइयां। घरों में बनने वाले ये पकवान धीरे-धीरे दुकानों पर मिठाई के रूप में प्रचलित हो गए। आज भले ही बाजार में कई प्रकार की मिठाइयां हैं, कीमत भी काफी है और खूब बिकती हैं, पर यह उस दौर की बात है, जब मिठाई आने का मतलब घर में खुशी।
तब के दौर के इन पकवानों में ही मिठाई की मिठास और अपनत्व के रस भरे घोल के अहसास ने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया। फिर क्षेत्र विशेष की सीमा से बाहर निकलकर चारों ओर फैलाव। हित-नाते में कहीं संदेश (सौगात) भेजना हो तो यही था।
शुद्ध, सुपाच्य। गयाजी और जहानाबाद का अनरसा हो या अररिया का गुलगुला। गुलगुला सीमांचल क्षेत्र में खूब प्रसिद्ध है। इसी तरह अनरसा मगध क्षेत्र से होता हुआ अब दूसरी जगहों पर प्रसिद्धि पा चुका है।
गयापाल पुरोहितों से अनरसा का रिश्ता
जब बात गयाजी और जहानाबाद के अनरसा की होती है, तो इसके रिश्ते गयाजी के गयापाल पुरोहितों से जुड़ते हैं। इस समाज का इससे गहरा नाता रहा है।
पहले जब आज की तरह भिन्न-भिन्न प्रकार की मिठाइयां नहीं होती थीं, जब शादी-ब्याह में सौगात के रूप में अनरसा और बताशा भेजे जाने की परंपरा थी। यह आज भी है।
तीर्थ पुरोहित महेश लाल गुपुत बताते हैं कि उनके समाज में अनरसा की पांच, 21 और 51 टोकरी रखना शुभ माना जाता है। पड़ोसी जिले जहानाबाद में भी अनरसा की पैठ कुछ ऐसी ही है। यहां विशेष रूप से तीज और करमा जैसे पर्व में अनरसा चढ़ाया जाता है।
जहानाबाद के महिला थाना रोड में अनरसा बनाने वाले मुकेश कुमार बताते हैं कि उन्होंने यह कला गयाजी के रमना रोड में सीखी थी। अनरसा मगध से होता हुआ दूसरे क्षेत्रों में भी पहुंच चुका है। घरों में भी बनाया जाता है।
अनरसा बनाने के लिए मुख्य सामग्री
पुराना अरवा चावल : अनरसा के लिए हमेशा पुराने चावल को प्राथमिकता दी जाती है। उसे पीसकर पिट्ठी बनाई जाती है।
गुड़ : इसमें गुड़ का ही प्रयोग किया जाता है। हालांकि, अब चीनी का भी चलन बढ़ा है।
पोस्ता दाना : पिट्ठी (गोलाकार) बनाने के बाद उस पर पोस्ता दाना चढ़ाया जाता है।
खोया : स्टफिंग के लिए और तलने के लिए घी या रिफाइंड तेल।
बनाने की विधि : अनरसा बनाने की कला यानी एक तरफ से सिकाई का हुनर। सबसे पहले पुराने अरवा चावल को दो से तीन दिनों तक भिगोया जाता है। फिर इसे सुखाकर महीन पीस लिया जाता है। फिर चावल के आटे को गुड़ या चीनी के साथ गूंथ लिया जाता है। एक थाली में पोस्ता दाना छिड़क दिया जाता है।
गूंथे हुए आटे की छोटी-छोटी पूरियां बनाकर उसे पोस्ते पर रखा जाता है, ताकि चिपक जाएं। यदि खोये वाला अनरसा बनाना है तो पूरियां बनाकर उसमें भूना हुआ खोया भर दिया जाता है। इसके तलने की तकनीक महत्वपूर्ण है।
इसे तेज आंच पर गर्म तेल में डाला जाता है, फिर आंच मध्यम कर दी जाती है। अनरसे को केवल एक ओर से पकाया जाता है। पकाते समय कड़ाही का गर्म तेल लगातार इसके ऊपरी हिस्से पर डाला जाता है, जिससे वह फूलकर कुरकुरा और जालीदार हो जाता है। अब अनरसा तैयार है।
बिहारी डोनट यानी अररिया का गुलगुला
सीमांचल में गुलगुले की विशेष पहचान है। इसे बिहारी डोनट कह सकते हैं। रश्मि बताती हैं कि यह प्राचीन पकवान है। सहज, सस्ता और आसानी से बनने वाला। एक आध सप्ताह रख लें तो खराब नहीं होता है।
यह नरम और स्पंजी होता है। ग्रामीण इलाकों में महिलाएं इसे सामूहिक रूप से बनाती हैं। अररिया की रहने वाली शांति देवी बताती हैं कि गांवों में जब पहली बारिश होती है या शाम को गपशप का दौर चलता है, तब महिलाएं एक साथ मिलकर गुड़ के घोल से गुलगुले छानती हैं।
गुलगुला बनाने की मुख्य सामग्री: गेहूं का आटा, गुड़, सौंफ और इलायची।
बनाने की विधि
सबसे पहले गुड़ की चाशनी बनाते हैं। उसमें आटा, सौंफ और इलायची मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है। फिर घोल को एक-दो घंटे छोड़ दिया जाता है, ताकि वह अंदर से फूला रहे। इसके बाद इसकी गोलियां बनाकर सुनहरा होने तक तला जाता है।