देश के जिला अदालतों में 10 लाख से ज्यादा केस लंबित है। उसमें भी आठ लाख केस ऐसे हैं, जो छह महीने से ज्यादा पुरानी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एग्जीक्यूशन याचिकाओं की भारी पेंडेंसी को देखते हुए कहा कि, “यह स्थिति बहुत डरावनी और निराशाजनक है।”
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने जिला न्यायपालिका द्वारा अपने आदेश को लागू करने के लिए किए गए प्रयासों की तारीफ की, क्योंकि पिछले छह महीनों में 4.3 लाख से ज्यादा एग्जीक्यूशन याचिकाओं का फैसला किया गया था और मार्च 2025 में उसके निर्देशों के बाद पिछले एक साल में लगभग 7.7 लाख मामलों का निपटारा किया गया।
फैसला आने के बाद भी लटका रहता है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स से कहा है कि, वे इन लंबित मामलों का तेजी से निपटारे के लिए एक सिस्टम लागू करें। खासकर प्रॉपर्टी विवादों में, इसमें सिर्फ फैसला देना ही काफी नहीं होता। इसमें ज्यादातर समय, जीतने वाली पार्टी को आदेश को लागू करवाने के लिए फिर से कोर्ट जाना पड़ता है और एक एग्जीक्यूशन याचिका दायर करनी पड़ती है।
अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को होगी
वहीं, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस पंकज मिथल की बेंच ने एग्जीक्यूशन याचिकाओं का छह महीने के अंदर निपटारा करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही पेंडेंसी के डेटा की जांच करने के बाद, बेंच ने कहा, हाई कोर्ट्स से एक व्यवस्था बनाने और अपने जिला न्यायालयों को एग्जीक्यूशन याचिकाओं के जल्द निपटारे के लिए मार्गदर्शन देने को कहा था, लेकिन हाई कोर्ट्स ने अभी तक उन उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी नहीं दी है। इसके बाद उन्हें अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अगली सुनवाई की तारीख, 7 अक्टूबर 2026 तय की है। कोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति सभी हाई कोर्ट को भेजने का निर्देश भी दिया। बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने एग्जीक्यूशन याचिकाओं की सुनवाई को व्यवस्थित करने की यह पहल तब शुरू की, जब उनके सामने एक ऐसा मामला आया जिसे 2006 में संपत्ति विवाद में हाई कोर्ट और SC से अपने पक्ष में फैसला मिला था। हालांकि दो दशक बीतने के बाद भी एग्जीक्यूशन याचिका निचली अदालत में लंबित थी। जिसके कारण याचिका कर्ता पूर्ण न्याय से वंचित थे।