एसिड हमलों में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘दोषी की संपत्ति जब्त कर पीड़िता को दिया जाए मुआवजा’…

 एसिड हमलों के मामले में सुप्रीम कोर्ट बहुत सख्त है। कोर्ट ने इस अपराध की सजा और सख्त करने के सुझाव दिए हैं ताकि अपराधियों में डर पैदा हो और अपराध रुके। कोर्ट ने सवाल किया कि पीडि़ता को मुआवजा देने के लिए अभियुक्त की संपत्ति जब्त क्यों नहीं की जा सकती।

शीर्ष अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि अगर कोई व्यक्ति एसिड हमले का दोषी पाया जाता है तो उसकी सभी अचल संपत्तियों को जब्त कर पीड़िता को मुआवजा क्यों नहीं दिया जाए।

कोर्ट ने कड़ी सजा की जरूरत बताते हुए कहा कि यह अपराध दहेज हत्या जैसा गंभीर है। कुछ असाधारण उपाय करने होंगे। जबतक कार्रवाई इतनी कठोर न हो, कारगर नहीं होगी।

निर्दोष होने का भार अभियुक्त पर डालने जैसे उपायों पर विचार करने और इसमें विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता भी बताई। इन मौखिक टिप्पणियों के साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एसिड हमलों के लंबित मामलों का ब्योरा मांगा है। साथ ही पीड़िता के पुर्नवास की स्थिति भी बताने को कहा है।

ये टिप्पणियां और निर्देश प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, आर. महादेवन और जोयमाल्या बाग्ची की पीठ ने एसिड हमले की पीडि़त की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे चार सप्ताह में अपने यहां एसिड हमलों के लंबित मामलों का वर्षवार ब्योरा दें।

बताएं कि आरोपपत्र दाखिल हुए हैं या नहीं। कितने मामलों में फैसला हो चुका है और कितने विचाराधीन हैं। इसके साथ ही एसिड हमले की प्रत्येक पीड़िता का संक्षिप्त ब्योरा भी मांगा है जिसमें उसकी शैक्षणिक योग्यता, रोजगार की स्थिति, वैवाहिक स्थिति, चिकित्सा उपचार, राज्य द्वारा किए गए और किए जाने वाले व्यय का विवरण मांगा है।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य उन मामलों का अलग से विवरण दें जिनमें एसिड पीने को मजबूर किया गया था। कोर्ट ने केंद्र की ओर से पेश एएसजी अर्चना पाठक दवे से कहा कि कुछ विधायी हस्तक्षेप के बारे में सोचें। ये दहेज हत्या से कम गंभीर मामला नहीं है।

सीजेआइ ने सुझाव दिया कि इस अपराध में भी ‘बर्डन आफ प्रूव’ अभियुक्त पर डाला जा सकता है। इससे पहले मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि एसिड हमला पीडि़त याचिकाकर्ता शाहीन मलिक के केस में सभी आरोपित बरी हो गए हैं और पीड़िता ने फैसले के खिलाफ अपील की है।

इस पर कोर्ट ने उसे कानूनी सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव किया। जिस पर कोर्ट में मौजूद पीड़िता ने कहा कि उसने अपने जीवन के 16 बहुमूल्य वर्ष कानूनी लड़ाई में व्यतीत किए और अंत में हमलावरों को बरी होते देखा। उसने पीठ से अनुरोध किया कि हाई कोर्ट को उसकी अपील पर जल्दी निर्णय लेने का निर्देश दिया जाए।

कोर्ट के पिछले आदेश के अनुपालन में कुछ उच्च न्यायालयों ने एसिड हमले के लंबित मामलों का ब्योरा कोर्ट में भेजा था जिसके मुताबिक उत्तर प्रदेश में 198, बंगाल में 60, गुजरात में 114, बिहार में 68 और महाराष्ट्र में 58 मामले लंबित हैं।

कुछ उच्च न्यायालयों ने अभी रिपोर्ट नहीं भेजी है जिसका इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से अनुरोध किया है कि वे एसिड हमलों के मामलों को प्राथमिकता के आधार पर समयबद्ध तरीके से निपटाने पर विचार करें।

साथ ही कोर्ट ने सभी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को एसिड हमला पीड़ितों के पुनर्वास, मुआवजे और चिकित्सा सहायता के लिए लागू की गई योजनाओं (यदि हों तो) का विवरण पेश करने का निर्देश दिया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पीड़िता ने कहा कि एसिड हमले में असहनीय दर्द और पीड़ा होती है। उसकी अब तक 25 सर्जरी हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि कई पीड़िताएं पूरी तरह आंखों की रोशनी खो चुकी हैं और उन्हें पुर्नवास का इंतजार है।

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