UGC के नए नियमों पर देशभर में बवाल: कहीं पोस्टर, कहीं इस्तीफा… सवर्ण समाज क्यों भड़का? पूरी डिटेल…

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए समता विनियमन (इक्विटी रेगुलेशन) पर सवर्ण समाज का विरोध और तेज हो गया है। इस नए कानून से देशभर में फैलता आक्रोश मंगलवार को खुद यूजीसी के दरवाजे पर पहुंच गया।

बैरिकेडिंग और वर्षा के बीच आइटीओ स्थित यूजीसी मुख्यालय के बाहर छात्रों के साथ ही विभिन्न संगठनों ने विरोध प्रदर्शन कर यूजीसी द्वारा तय नियमों का कड़ा एतराज जताया और उसे वापस लेने की मांग की।

उधर, बरेली में सोमवार को इसे सवर्ण विरोधी व समाज के लिए विभाजनकारी बताकर सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया। मंगलवार को उन्हें निलंबित कर दिया गया।

भाजपा के अंदर भी इसे लेकर जबर्दस्त गुस्सा है। कई भाजपा नेता व जनप्रतिनिधि इसके विरोध में खुलकर बोल रहे हैं। लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती में कई पार्टी पदाधिकारियों ने इस्तीफा तक दे दिया है। इस सबको देखते हुए केंद्र सरकार भी सतर्क हुई है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को इस पूरे मामले पर सवर्ण समाज की उन सभी आशंकाओं को भी दूर करने की कोशिश की, जिसमें वह रेगुलेशन के दुरुपयोग की आशंका जता रहा है। साथ ही यह भरोसा भी दिया कि नए कानून का किसी भी वर्ग के खिलाफ गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान ने कहा- ‘ मैं विनम्रता से सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी का उत्पीड़न या कोई भेदभाव नहीं होगा और कोई भी कानून का गलत इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। इसमें चाहे यूजीसी हो, केंद्र हो या राज्य सरकार, यह उनका दायित्व होगा। जो कुछ भी व्यवस्था होगी, वह संविधान की परिधि के अंदर होगी। जो विषय आया है, उसकी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में व्यवस्था की गई है।’

प्रधान ने राजस्थान में पत्रकारों से कही गई अपनी यह बात अपने इंटरनेट मीडिया अकाउंट से भी जारी की। बता दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए यह विनियमन यूजीसी ने 13 जनवरी को जारी किया था।

मंत्रालय से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय मंत्री प्रधान का यह दावा रेगुलेशन के उन बिंदुओं के आधार पर किया है, जिसमें रेगुलेशन की परिभाषा के बिंदु 3 (सी) में भेदभाव की जो परिभाषा तय की है, उनमें कोई भी अपने खिलाफ किसी तरह के भेदभाव की शिकायत कर सकता है, इसमे सामान्य वर्ग भी शामिल है।

दूसरा- शिकायत के खिलाफ कार्रवाई के लिए जो दस सदस्यीय कमेटी बनाने की बात कही गई है, उनमें एससी-एसटी व ओबीसी से तीन सदस्य ही रहेंगे, जबकि बाकी सात सदस्य कोई भी हो सकते हैं।

तीसरा- यूजीसी प्रत्येक छह महीने में प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थानों से इसके तहत की गई कार्रवाई का ब्यौरा लेगा। साथ ही वह यह देखेगा कि किसी के साथ इसका दुरुपयोग न होने पाए। इस बीच, यूजीसी के नए नियमों को लेकर यूपी में आक्रोश बढ़ गया है।

नियमों के विरोध में बरेली में त्यागपत्र देने वाले सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री निलंबित कर दिए गए। इसे बाद नारेबाजी-जुलूस के बीच वह कई समर्थकों के साथ चार घंटा डीएम कार्यालय के सामने धरने पर बैठे।

संवेदना जताने के बहाने उनके पास विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय की फोन काल भी पहुंची। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उन्हें फोन कर संवेदना व्यक्त की, फिर कहा कि आपने सरकारी पद छोड़ा है, इसके बदले हम धार्मिक पद प्रस्तावित करते हैं।

उधर, लखनऊ सहित कई जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए। भाजपा के अंदर भी इसे लेकर जबर्दस्त गुस्सा है। लखनऊ, बहराइच, श्रावस्ती में कई पार्टी पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है। कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं ने इसके विरोध में प्रधानमंत्री की मन की बात कार्यक्रम का भी बहिष्कार किया।

जातिगत भेदभाव की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

यूजीसी के हाल में जारी नियमों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। आरोप लगाया गया है कि इसमें जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और संस्थागत सुरक्षा से कुछ श्रेणियों को बाहर कर दिया गया है।

याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026’ का नियम 3 (सी) गैर-समावेशी है और जो छात्र एवं शिक्षक आरक्षित श्रेणियों के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।

विनीत जिंदल द्वारा दाखिल याचिका में कहा गया है कि इसमें जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के खिलाफ परिभाषित किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि यह नियम अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

हापुड़ के बक्सर में लगे पोस्टर, भाजपा नेता वोट मांगने न आएं

पिछले चार दिनों से हापुड़ के बक्सर गांव में 150 से अधिक परिवारों ने अपने घरों के बाहर भाजपा नेताओं के खिलाफ पोस्टर चस्पा कर दिए हैं। इन पोस्टरों पर लिखा है कि भाजपा नेता वोट मांगने न आएं, यह सवर्ण समाज का घर है। ”सवर्ण एगेंस्ट बीजेपी एंड यूजीसी”।

बक्सर गांव भाजपा का एक मजबूत गढ़ माना जाता है। यहां के युवा और हिंदू परिवार भाजपा के कट्टर समर्थक रहे हैं। आगरा में भाजपा नेता और पूर्व पार्षद जगदीश पचौरी ने इसको लेकर खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भेजा है।

उन्होंने लिखा है कि हम यूजीसी के नए नियमों को वापस लेने को निवेदन करते हैं। क्योंकि ये नियम छात्रों के भविष्य में दुष्परिणाम देगा।

नियमों में यह किए गए हैं अहम बदलाव

भेदभाव के दायरे को विस्तार देना: वर्ष 2012 के नियमों की तुलना में 2026 के नियमों में भेदभाव की परिभाषा को अधिक सख्त और विस्तृत बनाया गया है। जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा का दायरा भी बढ़ाया गया है।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के साथ अब अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों व कर्मचारियों को भी इसके दायरे में लाया गया है। 2012 के रेगुलेशन में सिर्फ एससी व एसटी को जातिगत भेदभाव में रखा गया था।

झूठी शिकायतों पर दंड हटाना: 2012 के नियमों में भेदभाव से जुड़ी झूठी शिकायतों पर जुर्माने व दंड के उपाय थे, जबकि 2026 के रेगुलेशन में से इसको हटा दिया गया है। इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि ऐसा होने से असली पीड़ित शिकायत करने से डरे नहीं।

सख्त निगरानी तंत्र: नए नियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान को समता दस्ते और समता दूत की अनिवार्य रूप से नियुक्ति करनी होगी। वहीं भेदभाव के मामलों पर सात दिनों के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट देनी होगी।

साथ ही दंड विधि के तहत कोई मामला बनता है तो पुलिस अधिकारियों को तत्काल सूचित किया जाएगा।

संस्थानों पर जिम्मेदारी: यदि संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो यूजीसी उनकी डिग्री, वित्तीय मदद या ऑनलाइन कोर्सों के संचालन आदि से रोक लगाने जैसी दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है।

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