ट्रंप के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्रीय बैंक और चुनावी नियमों पर हार…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को देश की सर्वोच्च अदालत से एक ही दिन में दो बड़े झटके लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल केंद्रीय बैंक (फेडरल रिजर्व) की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए ट्रंप द्वारा फेड गवर्नर को हटाने के अभूतपूर्व प्रयास को खारिज कर दिया, बल्कि डाक-मतपत्रों को लेकर भी उनके खिलाफ फैसला सुनाया। इन फैसलों ने राष्ट्रपति की असीमित शक्तियों की महत्वाकांक्षा को तगड़ा झटका दिया है।

फेड गवर्नर लिसा कुक को हटाने की कोशिश नाकाम

कोर्ट ने 5-4 के बहुमत से ट्रंप के उस कदम को रोक दिया, जिसके तहत वह फेडरल रिजर्व की गवर्नर लिसा कुक को बर्खास्त करना चाहते थे। साल 1913 में केंद्रीय बैंक की स्थापना के बाद से किसी राष्ट्रपति द्वारा किसी फेड अधिकारी को हटाने का यह पहला और अनोखा प्रयास था।

प्रधान न्यायाधीश जान राबर्ट्स ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि गवर्नरों का कार्यकाल 14 वर्षों का होता है और उन्हें केवल ठोस कानूनी कारणों से ही हटाया जा सकता है, राष्ट्रपति की मर्जी से नहीं।

लिसा कुक, जो फेड की पहली अश्वेत महिला गवर्नर हैं, ने भावुक होते हुए कहा कि यह फैसला अमेरिकी जनता के आर्थिक कल्याण और केंद्रीय बैंक को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए बेहद जरूरी था। हालांकि, बौखलाए ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए तुरंत जवाबी कार्रवाई की बात कही है।

डाक-मतपत्रों पर भी रिपब्लिकन चुनौती खारिज

ट्रंप को दूसरा झटका चुनावी नियमों के मोर्चे पर लगा। सुप्रीम कोर्ट ने मिसिसिपी में डाक-मतपत्रों के लिए पांच दिनों की ‘ग्रेस पीरियड’ की अनुमति देने वाले राज्य के कानून को बरकरार रखा और रिपब्लिकन पार्टी की याचिका खारिज कर दी।

ट्रंप आगामी कांग्रेस चुनावों से पहले देश भर में डाक-मतपत्रों के इस्तेमाल को पूरी तरह बंद करने की जिद पर अड़े थे। कोर्ट के इस फैसले से अब चुनाव के दिन या उससे पहले पोस्टमार्क किए गए मतपत्रों को, चुनाव के पांच दिन बाद तक मिलने पर भी वैध माना जाएगा।

बहुमत के बावजूद न्यायपालिका का कड़ा संदेश

इन फैसलों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट में 6-3 से कंजर्वेटिव न्यायाधीशों का बहुमत होने के बावजूद ट्रंप को हार का सामना करना पड़ा। फेडरल रिजर्व वाले मामले में प्रधान न्यायाधीश राबर्ट्स और जस्टिस ब्रेट कवानाग ने उदारवादी जजों का साथ दिया, जबकि मतपत्र वाले मामले में जस्टिस एमी कोनी बैरेट और राबर्ट्स उदारवादियों के साथ खड़े नजर आए।

अमेरिकी न्यायपालिका ने यह साफ कर दिया कि लोकतंत्र में संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता किसी भी राजनीतिक इच्छाशक्ति से ऊपर है।

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