सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेप पीड़िता को ट्रायल के दौरान क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए बार-बार कोर्ट बुलाकर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने त्रिपुरा HC के एक आदेश को रद कर दिया। जिसमें HC ने आरोपी की उस अर्जी को मंजूरी दे दी थी, जिसमें पीड़िता को दोबारा जांच के लिए बुलाने की मांग की गई थी।
जबकि चार साल पहले ही उसका क्रॉस-एग्जामिनेशन हो चुका था। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता पहले ही ट्रायल कोर्ट में चार अलग-अलग मौकों पर गवाही और क्रॉस-एग्जामिनेशन की मुश्किल प्रक्रिया से गुजर चुकी है। इसके अलावा, जांच के दौरान और CrPC की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने भी उसका बयान दर्ज किया जा चुका है।
रेप पीड़िता को बार-बार कोर्ट न बुलाया जाए: SC
ऐसे में, क्रॉस-एग्जामिनेशन के चार साल बाद उसे दोबारा बुलाना बहुत ही कठोर कदम होगा। SC ने कहा, “उसे दोबारा बुलाने का निर्देश देने से पीड़िता को और भी ज्यादा और बेवजह की परेशानी होगी।
गवाहों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे बार-बार कोर्ट में पेश होने की परेशानी उठाएं, खासकर संवेदनशील मामलों में। अगर पीड़ितों को, खासकर जघन्य अपराधों के पीड़ितों को, क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए बार-बार कोर्ट में पेश होना पड़े, तो इससे उन्हें बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है।”
मालूम हो कि HC ने आरोपी की अर्जी पर क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 311 के तहत पीड़िता को दोबारा बुलाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने पाया कि यह अर्जी पीड़िता का क्रॉस-एग्जामिनेशन पूरा होने के चार साल बाद दायर की गई थी, और इतनी लंबी देरी के बाद पीड़िता को दोबारा बुलाने का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था।
शक्ति का इस्तेमाल सोच-समझकर किया जाना चाहिए: SC
इसलिए, कोर्ट ने राज्य सरकार की उस अर्जी को मंजूरी दे दी जिसमें HC के आदेश को चुनौती दी गई थी। CrPC की धारा 311 में कहा गया है कि “कोई भी अदालत, इस संहिता के तहत किसी भी जांच, मुकदमे या अन्य कार्यवाही के किसी भी चरण में, किसी भी व्यक्ति को पेश होने के लिए बुला सकती है। भले ही उसे गवाह के तौर पर उसे न बुलाया गया हो।”
अदालत ने कहा कि धारा 311 के तहत दी गई शक्ति निस्संदेह बहुत व्यापक है, और ऐसी शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए। वापस बुलाना कोई सामान्य बात नहीं है, और अदालत को दी गई विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल न्याय की विफलता को रोकने के लिए न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए, न कि मनमाने ढंग से।