फुटपाथों की बदहाल स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, नगरपालिकाओं से पूछा- कब तक होगा इंतजार?…

सुप्रीम कोर्ट ने चिह्नित फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के मौलिक अधिकार को मान्यता दी है। इसके साथ ही कहा कि ये सोचना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि एक चौड़ा, साफ तौर पर चिह्नित और बिना रुकावट वाला फुटपाथ हमारे शहरों व कस्बों की सुंदरता और वहां समान पहुंच को कैसे बदल सकता है।

यह सचमुच हमारे शहरी व ग्रामीण जीवन को बदलने वाला साबित हो सकता है। असल में, जहां भी सड़क है, वहां एक साफ तौर पर चिह्नित फुटपाथ बनाने में कितना समय या संसाधन लगता है?

पैदल चलने के मौलिक अधिकार के लिए बस इतनी ही जरूरत है कि आसानी से और बेफिक्री से चलने के लिए एक आरामदायक जगह हो। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या यह नगरपालिका का नागरिकों के प्रति न्यूनतम फर्ज नहीं होना चाहिए?

पैदल चलने की गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक जड़ें

शीर्ष अदालत ने कहा कि पैदल चलने की क्रिया ने हमेशा भारतीयों की कल्पनाशीलता को प्रेरित किया है। इसकी गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सुधारवादी जड़ें हैं।

पैदल चलना कम भाग्यशाली लोगों के लिए एक संघर्ष है, कई लोगों के लिए गतिमान अवस्था में ध्यान है, दूसरों के लिए प्रतिरोध है, जिज्ञासुओं के लिए खोज है और तेज सामाजिक-राजनीतिक सोच वाले लोगों के लिए एकजुट करने वाली रणनीति है।

इसने निश्चित रूप से स्वतंत्रता संग्राम के कुछ आदर्शों को प्रेरित और प्रज्वलित किया, जिनका सम्मान करना और उन्हें संजोना हमारा कर्तव्य है, जैसा संविधान के अनुच्छेद 51-ए में कहा गया है।

इस अर्थ में, पैदल चलना केवल गति नहीं है, यह निश्चित रूप से अनुच्छेद 19(1)(ए), अनुच्छेद 19(1)(बी) और अनुच्छेद 19(1)(सी) के तहत अभिव्यक्ति, सभा और संगठन बनाने के अधिकारों को भी समाहित करता है।

दुर्भाग्य से, हम इन पहलुओं को पहचानने में इस हद तक विफल रहे हैं कि ‘पैदल यात्री’ शब्द का अर्थ अब नकारात्मक या हीनतापूर्ण हो गया है।

हम उचित प्रतिबंधों के अधीन पैदल चलने की स्वतंत्रता पर जोर देने का प्रयास करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच का वितरण इस तरह से हो कि यह केवल मोटर-वाहन वाले वर्ग की ही बपौती बनकर न रह जाए।

कोर्ट ने कहा कि भले ही इसमें देर हो गई हो, लेकिन हमें अपने नागरिकों के लिए तय किए गए फुटपाथ पर चलने के मौलिक अधिकार को पक्का और सुरक्षित करना चाहिए।

ऐसे अधिकार को साफ तौर पर बताना और घोषित करना जरूरी है ताकि फुटपाथ बनाने और उनकी देखभाल करने की संबंधित जिम्मेदारी को समझा जा सके। यह जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और यहां तक कि पंचायतों की है।

मोटर वाहन अधिनियम, वाहनों पर आधारित

कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 फुटपाथ पर चलने के अधिकार की सुरक्षा के लिए बनाया गया कानून नहीं है। इससे पहले का कानून, मोटर वाहन अधिनियम, 1939 मुख्य रूप से वाणिज्यिक परिवहन को मानकीकृत करने और रजिस्ट्रेशन, लाइसेंसिंग और परमिट के जरिये राजस्व अर्जित करने वाला सिस्टम बनाने के मकसद से बनाया गया था।

इसके बाद आया मौजूदा 1988 का अधिनियम भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है। मोटर वाहन अधिनियम कानून के विषय के तौर पर ‘वाहन’ पर आधारित है, जबकि ‘इंसानी’ हित इसमें गौण हैं। मोटर वाहन को बस इतना ध्यान रखना है कि वह इन हितों का उल्लंघन न करे।

2017 के नियम सिर्फ दिशा-निर्देश

वर्ष 2017 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 22 जून, 2017 को मोटर वाहन (ड्राइविंग) नियमों, 2017 को अधिसूचित किया था, जिसमें ‘रोड यूजर’ (सड़क इस्तेमाल करने वाले) की परिभाषा में सड़क पर गाड़ी चलाने या यात्रा करने वाले व्यक्ति (चाहे गाड़ी में हो या किसी और तरह से) और पैदल चलने वाले व्यक्ति को शामिल किया गया है।

नियम-तीन में सड़क इस्तेमाल करने वालों और आम जनता के प्रति वाहन की जिम्मेदारी के बारे में बताया गया है। नियम-पांच में ड्राइवरों पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि वे पैदल चलने वालों, साइकिल चलाने वालों, बच्चों आदि जैसे सड़क पर कमजोर स्थिति वाले लोगों की सुरक्षा के लिए खास सावधानी और एहतियात बरतें।

नियम-नौ, उन चौराहों पर बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताता है जहां पैदल यात्रियों के लिए क्रासिंग वगैरह होती हैं। ये नियम मोटर वाहन चालक के लिए सिर्फ दिशा-निर्देश हैं, ये न तो तय फुटपाथ पर चलने के मौलिक अधिकार को मान्यता देते हैं और न ही मोटर वाली सड़क के मुकाबले फुटपाथ के अधिकार को प्राथमिकता देते हैं।

कोर्ट ने कहा कि अफसोस की बात है कि आज भी मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत संसद ने मोटर ट्रांसपोर्ट के लिए कोई पूर्णकालिक नियामक संस्था नहीं बनाई है। अध्याय-पांच के तहत बताई गई ट्रांसपोर्ट अथारिटीज नियामक संस्थाएं नहीं हैं।

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