कर्नाटक की राजनीति में हलचल, केंद्रीय मंत्री का दावा- स्टिंग ऑपरेशन के चलते गई थी सिद्धरमैया की कुर्सी…

कर्नाटक की सियासत एक ऐसे भंवर में फंस चुकी है, जहां सवालों के जाल और आरोपों के शोर के बीच बस एक ही गूंज है कि आखिर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया की कुर्सी के जाने की असली वजह क्या है? स्टिंग ऑपरेशन, ब्लैकमेलिंग और दिल्ली दरबार की बंद दरवाजों वाली बैठकों के सनसनीखेज दावों ने इस पूरे मामले में राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।

एक तरफ विरोधी खेमों से हो रही बयानों की बौछार ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया है कि सिद्धरमैया का 45 साल का बेदाग सियासी सफर अचानक इस अंजाम तक कैसे पहुंचा? दूसरी ओर इन गंभीर आरोपों पर सिद्धरमैया की चुप्पी भी सवालों में, जिससे अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। 

ऐसे में अब सवाल पूछे जा रहे हैं कि इतने बड़े-बड़े आरोपों के बावजूद सिद्धरमैया की यह चुप्पी विरोधियों को कोई मौका न देने की सोची-समझी रणनीति है या फिर पार्टी के भीतर सुलगती किसी बड़ी अंतर्कलह की मजबूरी? आरोप बड़े और गंभीर है कि एक कथित ‘स्टिंग ऑपरेशन’ और ब्लैकमेलिंग के जरिए सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।

पहले समझिए पूरा विवाद और आरोप क्या है?

बता दें कि इस पूरे विवाद की शुरुआत केंद्रीय मंत्री और जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी के एक बड़े और सनसनीखेज आरोप से हुई। आरोप यह है कि सिद्धरमैया को हटाने के लिए एक स्टिंग ऑपरेशन का इस्तेमाल किया गया था। इतना ही नहीं कुमारस्वामी ने यहां तक आरोप लगा दिया कि इसके पीछे मौजूदा मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का हाथ था।

दिल्ली दरबार की वो बैठकों पर भी सवाल

बात यही तक खत्म नहीं होती है, कुमारस्वामी का दावा है कि सिद्धरमैया को यह कहकर दिल्ली बुलाया गया था कि मंत्रिमंडल विस्तार पर चर्चा होगी, लेकिन वहां उन्हें स्टिंग से जुड़े कुछ दस्तावेज और वीडियो दिखाकर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया।

अच्छा, इस विवाद में न्यूजीलैंड से वीडियो कनेक्शन भी सामने आया। पूरे मामले को ऐसे समझा जा सकता है कि बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी चर्चा में है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि इसे न्यूजीलैंड से अपलोड किया गया था।

विवाद में नया मोड़ कब आया?

अब इस पूरे विवाद और आरोपों के बीच मामले में नया मोड़ तब सामने आया, जब निष्कासित भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल ने एक गंभीर आरोप लगाया। निष्कासित भाजपा विधायक का आरोप है कि सिद्धरमैया को किसी निजी मामले में ब्लैकमेल और धमकी देकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था।

आरोपों में कितना दम और सच्चाई?

हमें एक बात तो समझनी होगी कि अब तक इन सभी दावों का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इन आरोपों को उठाने वाले खुद विरोधी खेमे से हैं, कुमारस्वामी कांग्रेस के धुर विरोधी हैं और यतनाल को भाजपा से निलंबित किया जा चुका है।

बात अब राजनीतिक जानकारों की करें तो उनका मानना है कि इन बयानों के पीछे राजनीतिक खींचतान और विरोधियों की अपनी रोटियां सेकने की मंशा हो सकती है। इसलिए बिना सबूत के इन बातों को सच नहीं माना जा सकता।

सिद्धरमैया की चुप्पी के मायने क्या?

सोचने वाली बात यह है कि विवाद के केंद्र में होने के बावजूद सिद्धरमैया ने इस पर अब तक एक शब्द भी नहीं बोला है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी इस खामोशी के दो मतलब हो सकते हैं।

पहला हो सकता है कि वे इस विवाद को तूल न देना चाहते हों और चुप्पी साधकर इसे खुद-ब-खुद शांत होने देना चाहते हों। दूसरा मतलब कि शायद हो सकता है कि वे पार्टी के भीतर के संवेदनशील मामलों पर खुलकर बोलने से बच रहे हों।

सिद्धरमैया का बेदाग राजनीतिक सफर

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि सिद्धरमैया की पहचान दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े और कद्दावर नेता के रूप में रही है। उनके 45 साल के लंबे राजनीतिक करियर में कभी ऐसा कोई दाग नहीं लगा था।

दूसरी बात, जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ा था, तो उन्होंने बिना किसी बगावत के डीके शिवकुमार के लिए रास्ता साफ किया था, जिसकी काफी तारीफ हुई थी। ऐसे में राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर वे इन आरोपों का जवाब नहीं देते हैं, तो विरोधी दल भविष्य में इसका इस्तेमाल उनकी छवि को धूमिल करने के लिए कर सकते हैं।

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