प्रियंका प्रसाद (ज्योतिष सलाहकार): केवल व्हाट्सएप मेसेज 94064 20131
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े बेटे भगवान कार्तिकेय को समर्पित होती है। कार्तिकेय जी को प्यार से ‘स्कंद’ भी कहा जाता है।
आइए बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं कि इस बार मार्च में यह व्रत कब है, इसकी पूजा कैसे करनी है और इसका असल महत्व क्या है।
पंचांग के अनुसार, इस बार चैत्र महीने (Chaitra Month) के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि 23 मार्च 2026 की शाम 06 बजकर 38 मिनट से शुरू हो चुकी है। यह तिथि अगले दिन यानी 24 मार्च को शाम 04 बजकर 07 मिनट पर समाप्त होगी।
हिंदू धर्म में हमेशा ‘उदया तिथि’ (यानी सूर्योदय के समय की तिथि) को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसलिए, स्कंद षष्ठी का यह व्रत 24 मार्च को ही रखा जाएगा।
पूजा की एकदम आसान विधि
इस व्रत की पूजा बहुत ही सरल है। बस इन आसान बातों का ध्यान रखें:
- व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर नहा लें और साफ सुथरे कपड़े पहन लें।
- घर के मंदिर या पूजा वाली जगह की अच्छे से सफाई करें।
- एक लकड़ी की चौकी पर भगवान कार्तिकेय और पूरे शिव परिवार (शिव जी, माता पार्वती और गणेश जी) की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- सच्चे मन से उन्हें फूल, फल और धूप-दीप (अगरबत्ती और दीया) अर्पित करें।
- पूजा के दौरान भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जाप करें और ‘स्कंद षष्ठी व्रत कथा’ जरूर पढ़ें या सुनें।
- आखिर में भगवान को भोग लगाकर आरती करें और पूरे परिवार को प्रसाद बांटें।
क्यों इतना खास है यह व्रत?
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों की मानें तो स्कंद षष्ठी को जीत और शक्ति का दिन माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जो भी इंसान सच्चे मन से यह व्रत करता है, उसके जीवन में अपार सुख-शांति आती है।
यह व्रत मुख्य रूप से ‘संतान सुख’ के लिए किया जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चों के जीवन में तरक्की होती है और वे हर तरह की बीमारियों से बचे रहते हैं।