लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अगुवाई में सोमवार को विपक्षी INDI गठबंधन के सदस्यों और हजारों समर्थकों ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। उन्होंने कई मुद्दों की गहन जांच की मांग करते हुए एक संयुक्त याचिका दायर की।
इनमें चुनाव आयोग (EC) का कामकाज, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेंद्र कुमार को एकतरफा फैसले लेने से रोकना, एसआईआर के दौरान मतदाताओं के नामों को मनमाने ढंग से हटाना और ईवीएम के इस्तेमाल और तैनाती से जुड़ी व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल रहे। राहुल और अन्य याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर की वैधता पर सवाल उठाए बिना उसे रोकने और पंजाब व अन्य चुनावी राज्यों की वोटर लिस्ट में योग्य मतदाताओं को शामिल करने की मांग की।
कौन-कौन हैं याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे, टीएमसी के सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आरजेडी के तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, सीपीएम के एमए बेबी, सीपीआई के डी राजा, जेएमएम के महुआ माजी, एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले और आईयूएमएल के ईटी मोहम्मद बशीर शामिल हैं।
‘सीजेआई ने दिखाया आगे का रास्ता’
विपक्ष के प्रतिनिधिमंडल से मिलने से सीजेआई सूर्यकांत के इनकार पर राहुल ने कहा, “हम सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं। हमें खुशी है कि उन्होंने हमें आगे का रास्ता दिखाया है। यह बताना कि हम याचिका दायर कर सकते हैं, आगे का एक रास्ता है।”
याचिका में क्या अनुरोध किया गया?
याचिका में कोर्ट से अनुरोध किया गया कि वह सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक पैनल बनाए, जिसमें टेक्निकल एक्सपर्ट और जाने-माने लोग शामिल हों, ताकि वोटर लिस्ट डेटाबेस और एसआईआर रोलआउट की सत्यता की जांच की जा सके।
INDI गठबंधन ने एसआईआर से जुड़ी पूरी फाइलें, चुनाव आयोग की आपत्तियां, एक्सेस लॉग और मीटिंग के मिनट्स (कार्यवृत्त) मांगे हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह भी चाहा कि पैनल ईवीएम को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं, कार्य-विधियों, प्रोटोकॉल और तकनीकी आर्किटेक्चर की समीक्षा करे।
क्या तर्क दिया गया?
विपक्ष के नेताओं ने तर्क दिया कि यह याचिका व्यापक जनहित में दायर की गई है। इसका मकसद हर योग्य नागरिक के वोट देने के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करना, चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और सामूहिक कामकाज को बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन का काम पारदर्शी और कानूनी तरीके से हो, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा बना रहे।
नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में कथित तौर पर गैर-कानूनी बदलावों की ओर इशारा करते हुए याचिकाकर्ताओं ने वकील प्रसन्ना एस के जरिए कहा, “कानूनी तौर पर तय फॉर्म में बिना अधिकार के कोई शर्त जोड़ने से रजिस्ट्रेशन कराने वाले योग्य नागरिकों, खासकर पहली बार वोट देने वालों पर गैर-कानूनी बोझ पड़ सकता है। साथ ही इससे वे लोग भी लिस्ट से बाहर हो सकते हैं जो असल में इसमें शामिल होने के हकदार हैं।”
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने याचिका में कई कमियां बताईं तो विपक्षी गठबंधन के वकील ने कहा कि वे समय रहते उन्हें ठीक कर लेंगे।
विपक्ष के सदस्यों ने ECINET और ERONET वोटर लिस्ट डेटाबेस के सेंट्रलाइज्ड और अपारदर्शी कामकाज पर भी आपत्ति जताई। साथ ही, उन्होंने बिना उचित नोटिस, सुनवाई या गलत तरीके से हटाए गए नामों को वापस जोड़ने के असरदार सिस्टम के बिना बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाने पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि जब तक याचिका पर फैसला नहीं आ जाता तब तक चुनाव आयोग को लोकतांत्रिक तरीके से और संविधान के नियमों के अनुसार काम करना चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि फॉर्म 6 मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन से जुड़े 1960 के नियमों के मुताबिक हो।
वे चाहते थे कि चुनाव आयोग एसआईआर के दौरान हटाए गए सभी वोटरों के नाम बूथ-वार पब्लिश करे। साथ ही हर नाम हटाने की वजह और लिंग व उम्र के आधार पर हटाए गए नामों का ब्योरा भी दे और जो वोटर वोटर लिस्ट में शामिल होने के लायक पाए जाएं उनके नाम वापस जोड़ने के लिए एक असरदार और काम करने वाला सिस्टम बनाए।