बिहार की वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग (EC) को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी सूची चार सप्ताह के अंदर संबंधित सक्षम प्राधिकारी यानी गृह मंत्रालय को भेजी जाए, ताकि नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत उनकी नागरिकता पर फैसला लिया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब देश में नागरिकता दावों की जांच और सीमाओं की निगरानी को लेकर सख्ती बढ़ी हुई है। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग द्वारा जुटाई गई जानकारी गृह मंत्रालय को उन विदेशी नागरिकों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जो कथित तौर पर अवैध रूप से बांग्लादेश से भारत में दाखिल हुए हों।
जांच के दौरान लोगों को अपनी बात रखने का मिलेगा मौका
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, “संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार जरूरी फैसला करेगा। यह फैसला अगली लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले लिया जाना बेहतर होगा। साथ ही जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें नोटिस देकर अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।”
बेंच ने स्पष्ट किया कि अगर जांच के बाद संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक पाए जाते हैं, तो उनके नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर भी टिप्पणी की।
याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया की आवश्यकता और वैधता पर सवाल उठाए थे। इस पर अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया 23 साल के लंबे अंतराल के बाद की जा रही है और इसका उद्देश्य वोटर लिस्ट में मौजूद गंभीर विसंगतियों को दूर करना है। अदालत ने माना कि इतने बड़े स्तर पर की जा रही इस प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं, इसलिए इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।
SC ने चुनाव आयोग को सावधानी बरतने की भी नसीहत दी
वोटर सत्यापन के दौरान मांगे जा रहे दस्तावेजों को लेकर उठाए गए सवालों को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दस्तावेजों का वर्गीकरण एक स्पष्ट और तार्किक आधार पर किया गया है, जिसका सीधा संबंध वोटर लिस्ट की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखने से है।
हालांकि, SC ने चुनाव आयोग को सावधानी बरतने की भी नसीहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज नामों के साथ हल्के तरीके से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए और किसी भी संशोधन की प्रक्रिया कानून द्वारा तय नियमों के तहत ही पूरी की जानी चाहिए।
लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं: SC
चीफ जस्टिस ने कहा, “वैधता की धारणा आज भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वोटर लिस्ट में पहले से मौजूद नामों को बिना ठोस आधार और उचित प्रक्रिया के न हटाया जाए।” सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने राजनीतिक वैज्ञानिक बर्नार्ड मैनिन का भी हवाला दिया।
उन्होंने कहा, “किसी भी प्रतिनिधि सरकार के लिए वोटों की गिनती करने से पहले यह जानना जरूरी है कि किन लोगों को वोट देने का अधिकार है। लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उन लोगों की पहचान की प्रक्रिया भी है जिन्हें सरकार चुनने में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है।”
अदालत ने आगे कहा कि वोटर लिस्ट किसी भी राजनीतिक समुदाय का कानूनी रिकॉर्ड होती है। इसलिए इससे जुड़े विवाद केवल प्रशासनिक नहीं होते, बल्कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रतिनिधि सरकार की बुनियाद से सीधे जुड़े होते हैं।