पढ़ाई के साथ तनाव प्रबंधन भी सिखाएंगे स्कूल, शिक्षा मंत्रालय जल्द जारी करेगा नई गाइडलाइन…

खेलने, कूदने और पढ़ने की उम्र में बच्चों में तनाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए अब स्कूल उन्हें पढ़ाने के साथ तनाव मुक्त रहने की भी सीख देंगे।

शिक्षा मंत्रालय ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों की मदद से बच्चों को तनाव से बचाने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन पर काम शुरू किया है।

इसमें स्कूलों में पढ़ने वाले प्रत्येक बच्चे पर न सिर्फ नजर रखी जाएगी, बल्कि स्कूलों में पढ़ाने वाले प्रत्येक शिक्षक को भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस प्रशिक्षण की मदद से शिक्षक कक्षा में पढ़ाते समय ऐसे बच्चों को पहचान सकेंगे, जिन्हें तनाव हो रहा है।

इसके साथ ही काउंसलिंग और मेडिटेशन के जरिए उनके तनाव को भगाने में मदद करेंगे।शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों ने इस गाइडलाइन के जून के पहले हफ्ते तक आने की उम्मीद जताई है।

उन्होंने बताया कि अभी इस गाइडलाइन पर राज्यों के साथ अंतिम दौर की चर्चा चल रही है।

सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में पढ़ाई और परीक्षा परिणामों से जुड़े तनावों के साथ ही साइबर बुलिंग यानी इंटरनेट गेम, मैसे¨जग एप्स और अन्य इंटरनेट माध्यमों के जरिए भी बच्चों के तनाव ग्रस्त होने के मामले बढ़े हैं।

ऐसे में तैयार की जा रही नई गाइडलाइन में इन सभी पहलुओं से बच्चों को बचाने पर फोकस किया गया है।

खासकर कोविड के बाद से स्कूलों में मोबाइल या अन्य डिजिटल माध्यमों से पढ़ाने को बढ़ावा दिया गया है, जिससे बच्चों के बीच इसका इस्तेमाल तो बढ़ा है, लेकिन इसके सुरक्षित प्रयोग को लेकर बच्चों को सतर्क न करने से वे गे¨मग या इंटरनेट मीडिया के अन्य एप्स में फंस गए हैं, जो उनके तनाव बढ़ने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

तनाव के बढ़ते मामलों को लेकर नीति आयोग ने भी उठाए थे सवाल मंत्रालय ने यह पहल ऐसे समय शुरू की है, जब नीति आयोग ने भी हाल ही में बच्चों में तनाव बढ़ने के मामलों को लेकर सवाल उठाए थे। साथ ही कहा कि बच्चों को इससे बचाने के लिए काउंसलर नियुक्त करने की पहल पर भी शैक्षणिक संस्थानों ने काम नहीं किया।

वहीं तनाव ग्रस्त बच्चों को पहचानने के लिए शिक्षकों को भी प्रशिक्षण नहीं दिया गया। यही वजह है कि तैयार की जा रही नई गाइडलाइन में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर दिया गया है।

इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों के सुरक्षित इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया गया है। इस पहल में स्कूलों में बच्चों के माता-पिता और संरक्षकों के साथ लगातार बैठकों को शामिल किया जा रहा है ताकि बच्चों में देखे जाने वाले बदलावों पर चर्चा की जा सके।

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