एसबीआई रिपोर्ट में खुलासा: छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में न्यूनतम वेतन को लेकर सबसे ज्यादा असमानता…

भारत के लगभग एक चौथाई अस्थायी कार्यबल को कानूनी न्यूनतम वेतन से कम भुगतान मिलता है। भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई द्वारा जारी एक शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।

यह रिपोर्ट नवीनतम पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2025 के आंकड़ों पर आधारित है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों में वेतन नियमन के तरीके में विशाल अंतर को उजागर किया है। महिला श्रमिक सभी कम वेतन पाने वाले अस्थायी श्रमिकों का 45 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि कुल अस्थायी कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी केवल 25 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में क्या कहा गया?

रिपेार्ट में कहा गया है कि राज्यों को न्यूनतम वेतन अधिनियम को सख्ती से लागू करना चाहिए। छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड उन क्षेत्रों के रूप में उभरे हैं जहां सबसे अधिक उल्लंघन होते हैं।

छत्तीसगढ़ में लगभग 70 प्रतिशत अस्थायी श्रमिक कानूनी न्यूनतम से कम कमा रहे हैं। इसके बाद ओडिशा में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत और झारखंड में 65 प्रतिशत का है।

आंकड़ों से क्या पता चला?

आंकड़ों से पता चलता है कि इन विशेष क्षेत्रों में अस्थायी श्रमिकों का अधिकांश हिस्सा राज्य द्वारा वादे किए गए बुनियादी वित्तीय सुरक्षा के बिना काम कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 25 प्रतिशत अस्थायी श्रमिक कानूनी रूप से निर्धारित दरों पर नहीं कमा रहे हैं। यह वेतन की कमी इस बात का संकेत देती है कि श्रम कानून सबसे कमजोर आर्थिक वर्गों तक पहुंच नहीं बना पा रहे हैं।

शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्थायी श्रमिकों के बीच न्यूनतम वेतन अनुपालन में राज्य स्तरों पर बड़ी असमानताएं हैं।

महत्वपूर्ण आर्थिक योगदान देने वाले राज्य जैसे महाराष्ट्र और बंगाल भी इंफोर्समेंट में संघर्ष कर रहे हैं, जहां लगभग एक-तिहाई अस्थायी श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम से कम वेतन प्राप्त हुआ।

पंजाब में, लगभग 37.19 प्रतिशत अस्थायी कार्यबल न्यूनतम वेतन के स्तर से नीचे कमा रहा है। इसके विपरीत तमिलनाडु (4.58 प्रतिशत) और तेलंगाना (0.36 प्रतिशत) जैसे राज्यों ने अस्थायी कार्यबल के लिए न्यूनतम वेतन के मामले में बहुत अधिक अनुपालन दिखाया। आंध्र प्रदेश ने इस श्रेणी में कोई उल्लंघन नहीं दर्ज किया।

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