मौत को मात देने वाले रमेश ने बयां किया दर्द, विमान हादसे की पहली बरसी पर याद किया वह खौफनाक मंजर…

12 जून, 2025 को सुबह करीब नौ बजे 260 लोगों के जीवन की घड़ी रुक गई। कारण था अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़े बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान का कुछ सेकेंड बाद ही धरती से जा टकराना।

हादसे की जांच अभी चल रही है और कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं लेकिन जो चले गए वो कभी नहीं आएंगे… और जो बच गए उनके मस्तिष्क से उस भयावह हादसे के डरावने दृश्य कभी नहीं मिटेंगे।

इस हादसे में विमान में सवार यात्री विश्वास कुमार रमेश इकलौते भाग्यशाली थे जो जीवित बचे…इतना ही नहीं वह अपने पैरों पर चलते हुए दुर्घटनाग्रस्त विमान के मलबे के बीच से निकलकर बाहर आए थे। उनकी जान बच गई, मानसिक रूप से सामान्य करने का उनका उपचार भी हुआ लेकिन हादसे के एक साल बाद भी वह भयावह घटना की यादों से जूझ रहे हैं।

ब्रिटेन के लीसेस्टर इलाके में रह रहे 39 वर्षीय रमेश कहते हैं कि लोगों ने देखा कि हादसे में वह बच गए लेकिन बंद दरवाजे के पीछे उन्हें मानसिक रूप से कितना संघर्ष करना पड़ रहा हैं-उसे वह बयां नहीं कर सकते।

बताते हैं कि हादसे के साल भर बाद भी उन्हें नींद नहीं आती… आती भी है तो वह अचानक चौंककर उठ बैठते हैं। दिन में भी बेचैनी और डराने वाली यादों के साथ जीवन जी रहे हैं। कहते हैं- इस सबके बीच खुद को सामान्य बनाने और अपने परिवार का सहयोग करने की कोशिश कर रहा हूं।

हादसे की बुरी यादों के साथ जीवन जी रहे रमेश अकेले नहीं है…

जमीन पर हादसे के शिकार हुए लोग और उसके तमाम चश्मदीद गवाह शरीर पर चोटों के निशान और मस्तिष्क में बुरी यादों का गुबार लिए एक-एक दिन काट रहे हैं। उड़ान भरने के 32 सेकेंड बाद हुए हादसे में विमान में सवार चालक दल समेत कुल 241 लोगों की मौत हुई थी जबकि जमीन पर मौजूद 19 लोग की जान गई थी।

हादसे को बहुत नजदीक से देखने वालों में अजय परमार भी शामिल हैं। वह उसी मेडिकल कालेज काम्प्लेक्स में माली का काम करते थे जहां पर एयर इंडिया का विमान क्रैश हुआ था।

हादसे से कुछ सेकेंड पहले ही अजय अपने दोपहिया वाहन से घर के लिए रवाना हुए थे तभी सिर के ऊपर से उड़ता हुआ विमान उनसे कुछ सौ मीटर दूर तेज आवाज के साथ मेडिकल कालेज बिल्डिंग से जा टकराया।

अजय जब तक अपना वाहन रोक पाते तब तक वह विमान के बिखरे हुए तमाम जलते टुकड़ों के बीच पहुंच चुका था। बचने की तमाम कोशिश के बावजूद उनकी बाइक में भी आग लग गई और वह आग-धुंए के बीच बेहोश होकर गिर पड़े।

इसके बाद उनकी आंख खुली तो उन्होंने खुद को सिविल हास्पिटल में बेड पर लेटा पाया। वहां पर उनके झुलसे शरीर और डरावनी यादों से भरे मस्तिष्क का दो महीने तक इलाज चला।

इस इलाज से घाव भर गए लेकिन शरीर पर उसके निशान बाकी हैं। लेकिन मस्तिष्क से साल भर पहले की यादें नहीं निकल पा रही हैं। वह काम करने लायक नहीं रहे…इससे माली की उनकी नौकरी चली गई, इसके कारण पत्नी ने भी साथ छोड़ दिया। आज वह अपने सीमित क्षमता वाले शरीर और हादसे की बुरी यादों के साथ एकाकी जीवन बसर कर रहे हैं।

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