ईरान के साथ हुए समझौते को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने ही देश में घिरते नजर आ रहे हैं।
विपक्षी डेमोक्रेट्स तो पहले से हमलावर थे, लेकिन अब उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ सांसद, पूर्व मंत्री, रणनीतिकार और यहां तक कि उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी खुलकर विरोध में उतर आए हैं।
आलोचकों का आरोप है कि ट्रंप ने तेल की कीमतें घटाने और युद्ध से बाहर निकलने की जल्दबाजी में ईरान को ऐसी रियायतें दे दी हैं, जिनकी वह वर्षों से उम्मीद कर रहा था।
सीएनएन के अनुसार, पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने समझौते को “तुष्टीकरण की नीति” करार दिया, जबकि रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी ने इसे “दशकों की सबसे बड़ी विदेश नीति की भूल” बताया। कैसिडी ने दो टूक कहा, “इस समझौते के बाद ईरान मजबूत हुआ है और अमेरिका कमजोर।”
ट्रंप प्रशासन में ऊर्जा मंत्री रह चुके डैन ब्रूइलेट ने भी चेतावनी दी कि यह समझौता ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी साबित होगा। उनके मुताबिक तेल और ईंधन की बिक्री शुरू होने से ईरान को सालाना लगभग 60 अरब डालर की अतिरिक्त आय हो सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि यह धन एक बार फिर अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ सक्रिय संगठनों तक पहुंच सकता है।
ईरान को उम्मीद से बढ़कर मिला फायदा
एएनआई के अनुसार, सबसे तीखा हमला ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन ने किया। उन्होंने समझौते को “ईरान के पक्ष में झुका हुआ” बताते हुए कहा कि इससे तेहरान को आर्थिक और रणनीतिक लाभ तो मिल गया, लेकिन अमेरिका की प्रमुख चिंताओं का समाधान नहीं हुआ।
बोल्टन ने कहा कि ट्रंप जिस स्ट्रेट आफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने का दावा कर रहे हैं, उस पर भी समझौता कोई ठोस गारंटी नहीं देता। उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान भविष्य में जहाजों से शुल्क वसूल सकता है या समुद्री यातायात पर नई शर्तें लगा सकता है। उन्होंने कहा, “समझौते में ऐसी किसी गतिविधि पर रोक नहीं है।”
बोल्टन के अनुसार ट्रंप की प्राथमिक चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं, बल्कि अमेरिका में पेट्रोल की बढ़ती कीमतें थीं। उन्होंने कहा, “ट्रंप युद्ध से बाहर निकलना चाहते थे। वह पेट्रोल की कीमतों को लेकर चिंतित थे और खाड़ी क्षेत्र का तेल वैश्विक बाजार में लाकर कीमतें कम करना चाहते थे। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने क्या छोड़ा, इसकी उन्हें ज्यादा परवाह नहीं थी।
“उन्होंने आरोप लगाया कि समझौते में ईरान को प्रतिबंधों से राहत, आर्थिक लाभ और पुनर्निर्माण के अवसर दिए गए हैं, जबकि इसके बदले अमेरिका और इजरायल की रणनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। बोल्टन ने कहा, “यह उससे कहीं ज्यादा है, जितनी उम्मीद ईरानी शासन ने खुद की होगी।”
समझौते को कांग्रेस में मंजूरी दिलाना मुश्किल
फॉक्स न्यूज के अनुसार, सीनेट में भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। रिपब्लिकन सांसदों का कहना है कि वर्षों के प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई और भारी खर्च के बावजूद ईरान आज लगभग उसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां वह पहले था। टेक्सास के सीनेटर टेड क्रूज ने कहा, “जो शासन अमेरिका को नुकसान पहुंचाना चाहता है, उसे अरबों डालर देना बेहद खतरनाक विचार है। यह पैसा अंततः अमेरिकियों के खिलाफ ही इस्तेमाल होगा।
“रिपब्लिकन सांसद रोजर विकर ने 300 अरब डालर के पुनर्निर्माण फंड और प्रतिबंधों में ढील पर गंभीर सवाल उठाए हैं। वहीं कई सांसदों का मानना है कि यदि समझौते में बड़े बदलाव नहीं किए गए तो इसे कांग्रेस की मंजूरी दिलाना मुश्किल हो सकता है।
ट्रंप-वेंस का आलोचकों पर पलटवार बढ़ते विरोध के बीच ट्रंप ने आलोचकों पर पलटवार करते हुए उन्हें “ईर्ष्यालु, बुरे और मूर्ख लोग” बताया। वहीं, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान को प्रदर्शन के आधार पर फायदा मिलेगा, यदि उसने आनाकानी को तो उससे सबकुछ छिन जाएगा और वह फिर युद्ध के मुहाने पर पहुंच जाएगा।