प्रियांक खरगे का RSS पर निशाना, बोले- संगठन को खुद को पंजीकृत कराना चाहिए; मोहन भागवत ने बयान को बताया राजनीतिक…

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर संगठन की कानूनी स्थिति और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत को एक खुला पत्र लिखकर आरएसएस से खुद को पंजीकृत करने, अपनी संपत्ति, आय-व्यय के स्रोतों को सार्वजनिक करने और संवैधानिक जवाबदेही तय करने की मांग की है।

उधर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने उनकी इन मांगों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया। इंटरनेट मीडिया पर अपना पत्र साझा करते हुए प्रियांक खरगे ने कहा कि देश-विदेश में 60 हजार से अधिक शाखाएं और करोड़ों स्वयंसेवक होने का दावा करने वाले संगठन को पारदर्शिता और कानून का पालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले कर्नाटक में आरएसएस की 4,127 दैनिक शाखाएं और हजारों अन्य कार्यक्रम होते हैं। इतनी बड़ी जनभागीदारी और रूट मार्च जैसे आयोजनों को निजी या अनौपचारिक व्यवस्था नहीं माना जा सकता।

प्रियांक खरगे के मुख्य सवाल और मांगें खरगे ने अपने पत्र में पूछा कि जब आम नागरिकों, एनजीओ, ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों के लिए पंजीकरण और कानून का पालन अनिवार्य है, तो आरएसएस को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए?

उन्होंने संघ से निम्नलिखित जानकारियां सार्वजनिक करने का आग्रह किया – संगठन की कानूनी स्थिति, संरचना और अधिकृत पदाधिकारियों के विवरण। दान, आय के स्रोत, कुल संपत्ति और खर्च का ब्यौरा। सार्वजनिक कार्यक्रमों, सामूहिक सभाओं और रूट मार्च के लिए ली जाने वाली मंजूरियां।

मंत्री ने कहा कि राष्ट्रवाद और अनुशासन की बात करने वाले संगठन को खुद भी संविधान के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए। उन्होंने शताब्दी वर्ष को केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक आत्मनिरीक्षण’ के तौर पर मनाने की सलाह दी।

भागवत का जवाब: “यह सिर्फ राजनीति और हथकंडा है” केरलम के त्रिशूर में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ कोई गुप्त संगठन नहीं है और इसकी सभी गतिविधियां खुले मैदानों में जनता के सामने होती हैं।

भागवत ने कहा, “संघ को छिपाने के लिए कुछ नहीं है। हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है और सरकार को अच्छी तरह पता है कि संघ का अस्तित्व है।”

उन्होंने याद दिलाया कि संघ पर पहले दो बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है, जो इस बात का सबूत है कि सरकार इसकी पहचान से वाकिफ है। उन्होंने बताया कि संघ ने 1950 में ही अपना लिखित संविधान सरकार को सौंप दिया था और पिछले 100 वर्षों में किसी भी प्राधिकरण ने पंजीकरण के लिए दबाव नहीं डाला। भागवत के अनुसार, ऐसी मांगों का मकसद केवल संघ के काम में बाधा डालना और जनता के मन में संदेह पैदा करना है।

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