उत्तर प्रदेश में बारासिंघा वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) यानी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाएगा।
पर्यावरण मंत्रालय ने बारासिंघा वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के 408.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईएसजेड घोषित करने के लिए मसौदा अधिसूचना जारी की है। पर्यावरण मंत्रालय ने अधिसूचना पर हितधारकों और जनता से 60 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगे हैं।
ईएसजेड ऐसे क्षेत्र होते हैं जिन्हें मंत्रालय द्वारा संरक्षित क्षेत्रों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास अधिसूचित किया जाता है ताकि क्षेत्र में गतिविधियों को प्रबंधित करके इन क्षेत्रों के लिए बफर जोन बनाया जा सके। बारासिंघा वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश के पांच जिलों-मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़, बिजनौर और अमरोहा में फैला हुआ है।
16 अप्रैल को जारी की गई और शनिवार को प्रकाशित अधिसूचना में कहा गया है कि शुरुआत में इस अभयारण्य का क्षेत्रफल 2,073 वर्ग किलोमीटर था, जिसे बाद में तर्कसंगत बनाकर 1,159.16 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया।
इस अभयारण्य में विविध प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं जिनमें स्तनधारियों की 41 प्रजातियां, पक्षियों की 373 प्रजातियां, सरीसृपों की 36 प्रजातियां, उभयचरों की 10 प्रजातियां और मछलियों की 79 प्रजातियां शामिल हैं।
280 से अधिक पौधों की प्रजातियां भी पाई जाती हैं, जिनमें 81 औषधीय पौधों की प्रजातियां शामिल हैं।408.7 वर्ग किलोमीटर के ईएसजेड में मुजफ्फरनगर में 138.71 वर्ग किलोमीटर, बिजनौर में 155.02 वर्ग किलोमीटर, अमरोहा में 46.35 वर्ग किलोमीटर, हापुड़ में 18.35 वर्ग किलोमीटर और मेरठ में 50.04 वर्ग किलोमीटर शामिल है। ईएसजेड में 307 गांव शामिल हैं। गौरतलब है कि बारासिंघा उत्तर प्रदेश का राज्य पशु है।
रणथंभौर में दो किमी के दायरे में नजर आए बाघ, चीता और तेंदुआ
राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में एक बेहद दुर्लभ घटना सामने आई है। यहां एक ही समय में बाघ, तेंदुआ और चीता जैसे तीन शीर्ष शिकारी एक-दूसरे से लगभग एक से दो किलोमीटर के दायरे में देखे गए, जिसने पर्यटकों और वन्यजीव विशेषज्ञों को चौंका दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटना इसलिए भी खास है कि क्योंकि तीनों प्रजातियां अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों में रहती हैं। बाघ अपने क्षेत्र में अन्य शिकारियों पर दबदबा बनाए रखते हैं, जबकि तेंदुए उनसे बचकर घने इलाकों में रहते हैं। वहीं, चीते खुले घास के मैदानों में दिन के समय शिकार करते हैं। यह अनोखा नजारा रविवार को रिजर्व के जोन-9 में चाकल नदी के किनारे देखा गया।
वन विभाग के अनुसार, तीनों शिकारी एक-दूसरे से लगभग एक से दो किलोमीटर के दायरे में मौजूद थे।वन अधिकारियों ने बताया कि चीता केपी-2 कूनो नेशनल पार्क से भटककर राजस्थान पहुंचा है। चीता इस क्षेत्र में 11 घंटे तक रहा और फिर दूसरे क्षेत्र में चला गया।
रणथंभौर बाघ परियोजना के वन संरक्षक एस.पी.सिंह ने बताया कि चीता केपी-2 का मूवमेंट श्योपुर से करीब 40 किलोमीटर दूर बोदल एवं भैरूपुरा नाके में बना हुआ है। लगातार बाघ एवं चीते की ¨नगरानी की जा रही है।