500% टैरिफ की तैयारी… रूसी तेल पर शिकंजा कसने को ट्रंप तैयार, भारत पर कितना पड़ेगा असर?…

लंबे इंतजार के बाद भारत में अमेरिका के नये राजदूत सर्जियो गोर नई दिल्ली इस सप्ताहांत पहुंचने वाले हैं।

अमेरिकी दूतावास में उनके स्वागत की तैयारियां चल रही हैं। संभवत: अगले सोमवार को अपना कार्यभार संभालेंगे और इसके साथ ही भारत-अमेरिकी संबंधों पर अपना रुख रखेंगे।

लेकिन इसी बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को दो ऐसे फैसले किये हैं जो भारत व अमेरिका के तनावपूर्ण संबंधों को थोड़ा और जटिल बना दिया है।

ट्रंप प्रशासन ने जहां रूस से व्यापार करने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है वहीं अंतरराष्ट्रीय सोलर एलायंस (आईएसए) सहित 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग होने की घोषणा की है, जिसे वह ‘निरर्थक और हानिकारक’ मान रहा है।

ट्रंप ने रूस से व्यापार पर 500% टैरिफ को मंजूरी दी

आईएसए का मुख्यालय भारत (गुरूग्राम) में है और भारत की मंशा भविष्य में इसे तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक की तरह स्थापित करने की है।

अमेरिका के साथ कई मुद्दों की संवेदनशीलता को देखते हुए भारत की ओर से गुरुवार को इन दोनों ही मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इस बात की चर्चा है कि इन दोनों फैसलों का सीधा असर भारत पर होने की संभावना है।

भारत सधे कदमों से बढ़ना चाहता है। वह न तो अमेरिका को कोई अतिरिक्त मौका देना चाहता है और न ही दबाव में झुकता दिखना चाहता है।

भारतीयों की एक बहुत बड़ी आबादी भी अमेरिका में है। ट्रंप ने सीनेटर लिंडसे ग्राहम के प्रस्ताव पर रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने संबंधी विधेयक को मंजूरी दी है।

इसी हफ्ते सोमवार को ग्राहम और ट्रंप दोनों ने मीडिया से बात करते हुए भारत पर निशाना साधा था।

ट्रंप ने रूस से और तेल खरीदने की स्थिति में भारत पर लगाये गये शुल्क को बढ़ाने की भी धमकी दी थी। भारत मार्च, 2022 (यूक्रेन-रूस युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद) से बड़ी मात्रा में रूस से कच्चे तेल की खरीद की है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरफ से इसे रोकने की कोशिश लगातार हो रही है। इस क्रम में ही ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 फीसद का अतिरिक्त शुल्क (कुल 50 फीसद) लगा चुका है। इ

सके बाद भारत ने यह साफ किया है कि वह रूस से तेल की खरीद काफी कम कर चुका है। यहां यह भी बताते चलें कि नये राजदूत गोर ने भी सितंबर, 2025 में कहा था कि भारत जाने के बाद उनकी पहली प्राथमिकता रूस से तेल खरीद को कम करने की होगी।

अमेरिका के बाहर होने से आईएसए के लिए फंड जुटाने की समस्या बढ़ेगी

इसी तरह से ट्रंप प्रशासन की तरफ से आइएसए से बाहर निकल जाने से इस संगठन के सामान्य संचालन पर तो कोई असर नहीं होगा लेकिन अमेरिका जैसे बड़े देश के बाहर हो जाने से इसके लिए फंड जुटाने की चुनौती और बढ़ जाएगी।

आईएसए की स्थापना भारत व फ्रांस ने संयुक्त तौर पर की थी। अमेरिका का एक सक्रिय सदस्य रहा है। आइएसए ने वर्ष 2030 तक दुनिया भर में 1.95 लाख मेगावाट क्षमता की सौर ऊर्जा प्लांट लगाने का लक्ष्य रखा है।

इसने मुख्य तौर पर विकसित व गरीब देशों को सौर ऊर्जा से जुड़ी प्रौद्योगिकी लगाने में मदद देने का काम शुरू किया है ताकि धीरे धीरे ज्यादा प्रदूषण करने वाले ईंधन की खपत कम की जा सके।

इसने 1000 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाने की बात कही है। आईएसए के अधिकारियों ने कहा है कि उनका संगठन पहले की तरही का करता रहेगा लेकिन जानकारों का कहना है कि इस संगठन के लिए पहले ही फंड जुटाना एक बड़ी चुनौती थी। अमेरिका के बाहर जाने के बाद यह और बढ़ सकती है।

इन फैसलों से भारत-अमेरिका संबंधों में नया तनाव

भारत आईएसए को तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक की तरह ही विकसित करना चाहता है। यह ऊर्जा से जुड़ा पहला वैश्विक संगठन है जिसका मुख्यालय भारत में है।

जब कुछ ही वर्षो में 121 से ज्यादा देशों ने इस संगठन में शामिल हो गये तब भारत ने वर्ष 2023 में ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस (जीबीए) के नाम से स्वच्छ इंधन के क्षेत्र में एक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग संगठन स्थापित किया।

अमेरिका इसका भी सदस्य है। वैसे का काम अभी तक कागज पर ही सीमित है। इन दोनों संगठनों के जरिए भारत ने स्वच्छ ऊर्जा में एक प्रमुख केंद्र बनने की तरफ कदम बढ़ाया है।

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