सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बंगाल सरकार को कोलकाता मेट्रो रेल परियोजना के एक गलियारे के निर्माण में रोड़ा अटकाने के लिए कड़ी फटकार लगाई और कहा कि आम जनता के हित वाली विकास परियोजना का राजनीतिकरण नहीं किया जाए।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने राज्य सरकार की याचिका खारिज करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट को परियोजना की निगरानी करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति काफी उदारता दिखाई है। यह ऐसा मामला था, जिसमें बंगाल के मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी।
सीजेआई ने बंगाल सरकार की ओर से पेश वकील से कहा कि यह आपके संवैधानिक कर्तव्यों की पूरी तरह अनदेखी को दर्शाता है। आप अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘हमें हर चीज का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिये। यह विकास से जुड़ा मुद्दा है। यह आम जनता की सुविधा के लिये है।
इसमें बाधाएं पैदा नहीं करें।’ जब राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि आगामी चुनावों के कारण आदर्श आचार संहिता लागू है और बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं तो पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट का आदेश 23 दिसंबर 2025 का है और पूछा कि राज्य सरकार ने तब से अब तक निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया।
जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग इस परियोजना पर आपत्ति नहीं कर सकता, क्योंकि यह पहले से चल रही है और हाई कोर्ट इसकी निगरानी कर रहा है।
उन्होंने कहा कि यह परियोजना आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले शुरू की गई थी। हम राज्य को इसे फिर से विकास में बाधा डालने के बहाने के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे।
राज्य सरकार के वकील ने कहा कि निर्माण कार्य के दौरान सड़कें बंद करनी पड़ेंगी, जिससे एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाएं प्रभावित होंगी।
उन्होंने मई तक का समय मांगा, लेकिन शीर्ष न्यायालय ने यह अनुरोध ठुकरा दिया और 23 दिसंबर 2025 के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज करने की बात कही।
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश में कोई खामी नहीं है और हमें विश्वास है कि परियोजना समयबद्ध तरीके से पूरी होगी।