महाराष्ट्र में प्याज किसानों की बदहाली: 25 बोरे बेचने पर नहीं मिली कमाई, किसान के हाथ में थमा दिया 1 रुपये का बिल…

महाराष्ट्र में प्याज किसानों के आंसू निकाल रहा है। पैथान के एक किसान की प्याज बेचने की रसीद ने एक बार फिर महाराष्ट्र में गहराते कृषि संकट सामने ला दिया है।

छत्रपति संभाजीनगर के पैथान तालुका के वारुडी गांव के 45 वर्षीय किसान प्रकाश गलाधर ने पैथान एपीएमसी में प्याज के 25 बोरे बेचे, लेकिन उन्हें कुल मिलाकर सिर्फ 1,262 रुपये ही मिले, जो कि 1 रुपया प्रति किलो के हिसाब से था। परिवहन, तौल, भंडारण और अन्य शुल्कों की कटौती के बाद उनके पास कुछ भी नहीं बचा बल्कि उनसे उलटा 1 रुपया और देने को कहा गया।

‘फेंक दी बाकी फसल’

गलाधर ने कहा, “मैंने 3 मई को चार एकड़ जमीन पर उगाई गई प्याज बेचने की कोशिश की। बहुत कम दाम मिलने के बाद मैंने बाकी बची फसल भारी मन से फेंक दी।”

उनका 1 रुपये का बिल सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है और यह उस प्याज संकट का एक कड़ा प्रतीक बन गया है जिसने इस इलाके को अपनी चपेट में ले रखा है। यहां कीमतों में गिरावट ने प्याज की खेती को कई किसानों के लिए आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बना दिया है, जो पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं।

गलाधर ने कहा कि इन नुकसानों ने उनकी आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा, “मैंने कुछ साल पहले अपनी बेटी की शादी की थी और अभी भी मुझे अलग-अलग लोगों का पैसा चुकाना है। प्याज के संकट ने मुझे पूरी तरह से निराश कर दिया है।”

व्यापारियों का क्या कहना है?

व्यापारी इस भारी गिरावट की वजह कुछ हद तक प्याज की गुणवत्ता में कमी और बाजार में उसकी जरूरत से ज्यादा सप्लाई को मानते हैं।

पैथान एपीएमसी के ट्रेडर इब्राहिम बागवान ने कहा, “डील करने से पहले हमने उन्हें बता दिया था कि उन्हें इससे कुछ भी फायदा नहीं होने वाला है। इसके बावजूद, गलाधर ने इस उम्मीद में अपने प्याज बेचने की जिद की कि बाद में उन्हें सरकार से कुछ मदद मिल जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा कि अच्छी क्वालिटी के प्याज अभी 400-800 रुपये प्रति 100 किलो बिक रहे हैं। हालांकि, बाजार के अधिकारी एक बड़ी सिस्टम से जुड़ी समस्या को मानते हैं।

छत्रपति संभाजीनगर एपीएमसी के चेयरमैन राधाकिशन पाथाडे ने कहा, “प्याज की मांग और सप्लाई में बहुत बड़ा अंतर है और स्थानीय बाजारों में बहुत ज्यादा मात्रा में फसल आ रही है। इस समस्या को सुलझाने के लिए सरकार की मौजूदा खरीद और एक्सपोर्ट नीतियों में बदलाव करने की जरूरत है।”

उन्होंने बताया कि औसत कीमतें गिरकर लगभग 400 रुपये प्रति 100 किलो हो गई हैं। पाथाडे ने कहा, “किसानों को कम से कम 1,200 रुपये प्रति 100 किलो मिलने चाहिए लेकिन मांग और सप्लाई के बीच बिगड़ा हुआ अनुपात बहुत कम कीमतें दे रहा है।”

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