सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अंतरधार्मिक विवाह करने पर पारसी महिलाओं का धार्मिक बहिष्कार प्रथमदृष्टया भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्मजात होता है और इसे विवाह के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
यह पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी।
संविधान पीठ यह भी विचार कर रही है कि क्या किसी धार्मिक समुदाय के प्रमुख को सदस्यों का धार्मिक बहिष्कार करने का अधिकार, अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्ति के धर्म को मानने और उसका पालन करने के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
पारसी महिला के वकील ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान एक पारसी महिला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने कहा कि ऐसा करना कानून की दृष्टि से गलत है। महिला ने एक हिंदू पुरुष से शादी की थी, लेकिन अंतरधार्मिक विवाह के कारण पारसी समुदाय से बहिष्कृत किए जाने की सजा का सामना कर रही थी।
अधिवक्ता ने कहा, ‘मैं (महिला याचिकाकर्ता) एक भक्त हूं, मैंने अपना धर्म नहीं छोड़ा है, मैं एक आस्थावान व्यक्ति हूं। महज इसलिए कि मैंने हिंदू पुरुष से शादी की है (मुझे बहिष्कृत किया गया है), यह (अंतरधार्मिक विवाह) कोई अपराध नहीं है।’
उन्होंने यह भी कहा कि यह एक प्रगतिशील और महान धर्म पर थोपा गया प्रतिबंध है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि विवाह भेदभाव का आधार तभी हो सकता है जब कोई महिला किसी दूसरे धर्म के पुरुष से विवाह करे। पीठ ने टिप्पणी की कि इस तरह के चयनात्मक बहिष्कार का प्रभाव भेदभावपूर्ण प्रतीत होता है।
पीठ ने क्या टिप्पणी की?
जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, ‘अनुच्छेद 25(1) के तहत अंत:करण का अधिकार जन्मजात अधिकार है और इसे विवाह द्वारा छीना नहीं जा सकता। इस मामले में वर्गीकरण के आधार पर विवाह, महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण है।’
खंबाटा ने कहा, ‘यही सिद्धांत पुरुष पर लागू नहीं होता। (जबकि) यह दोनों पक्षों पर लागू होना चाहिए।’ जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘पारसी पिताओं की संतानें जन्म के आधार पारसी धर्म का लाभ उठाती हैं। यही बात पत्नी पर भी लागू होनी चाहिए। यह जन्म से प्राप्त धर्म है; इसे विवाह से छीना नहीं जा सकता।’