केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म पुरस्कारों की ‘अनाम नायकों’ की श्रेणी में पालघर के 90 वर्षीय आदिवासी कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।
भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा ने 10 साल की उम्र से ही बांस और लौकी से बने पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘तारपा’ को बजाते हैं। उन्होंने इस सम्मान को ईश्वर का आशीर्वाद बताया है।
आदिवासी कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा का पद्द पुरस्कार की लिस्ट में नाम आते ही पालघर भर में, विशेषकर क्षेत्र के आदिवासी समुदायों में, उत्सव का माहौल छा गया।
उनके परिवार की 400 साल पुरानी इस विरासत को मिला यह गौरव न केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि है, बल्कि महाराष्ट्र की समृद्ध आदिवासी कला और संस्कृति के प्रति एक बड़ी उपलब्धि है।
पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘तारपा’
90 वर्षीय ढिंडा, जिन्हें तारपा कला के बेहतरीन तारपा (लौकी और बांस से बना एक वाद्य यंत्र) के सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादकों में से एक माना जाता है, यह पुरस्कार परंपरा की सेवा में व्यतीत उनके जीवन का परिणाम है।
90 वर्षीय आदिवासी कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा ने कहा, मैंने अपनी संस्कृति को संरक्षित रखा है और अपने संगीत के माध्यम से ईश्वर की आराधना की है।
मैं 10 साल की उम्र से ही तारपा बजा रहा हूं। ‘यह 400 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा है। इसीलिए ईश्वर ने मुझे इस पुरस्कार से नवाजा है।’
दस फीट तक लंबी हो सकने वाली तारपा, जनजातीय अनुष्ठानों और समारोहों में एक केंद्रीय स्थान रखती है। ढिंडा के प्रदर्शनों ने महाराष्ट्र के कई हिस्सों में दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है, जिससे उन्हें आदिवासी कला के संरक्षक के रूप में पहचान मिली है।
पत्रकारों से बातचीत के दौरान ढिंडा ने बताया, ‘हम गरीब हैं, लेकिन हमारी संस्कृति ही हमारी असली दौलत है। मेरे परिवार में 22 सदस्य हैं। मेरा कोई और पेशा नहीं है। थोड़ी-बहुत खेती और तारपा के वाद्य यंत्र बनाना ही हमारी आजीविका का साधन है।’