वर्षा वर्मा 0 समाज सेविका (लखनऊ, उत्तरप्रदेश)
मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म मानते हुए आज तीन लावारिस शवों का पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों, सम्मान और गरिमा के साथ अंतिम संस्कार किया गया। यह सेवा केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति मानवीय संवेदना का प्रतीक है, जिनके निधन के बाद उन्हें अंतिम विदाई देने वाला कोई अपना मौजूद नहीं होता। ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम संस्कार मिलना समाज और मानवता के प्रति हमारी सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी है।
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करना अत्यंत संवेदनशील, चुनौतीपूर्ण और भावनात्मक कार्य माना जाता है। कई बार सड़क दुर्घटनाओं, बीमारी अथवा अन्य कारणों से ऐसे लोगों का निधन हो जाता है, जिनकी पहचान नहीं हो पाती या जिनका कोई परिजन सामने नहीं आता। ऐसे समय में समाजसेवी और स्वयंसेवी संगठन आगे बढ़कर उनकी अंतिम यात्रा को सम्मानजनक बनाने का कार्य करते हैं। यह सेवा इस बात का संदेश देती है कि मृत्यु के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति सम्मान और गरिमा का अधिकारी है।
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को जीवन के 16 संस्कारों में अंतिम एवं अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह संस्कार आत्मा की शांति और उसके अगले मार्ग की मंगलकामना के लिए किया जाता है। इसी कारण अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव जीवन की अंतिम सामाजिक जिम्मेदारी भी माना जाता है।
समय के साथ विभिन्न सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर महिलाओं के श्मशान घाट जाने को लेकर भी अलग-अलग परंपराएं विकसित हुई हैं। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, लोकमान्यताओं और सामाजिक रीति-रिवाजों में इस विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं।
वर्तमान समय में समाज के विभिन्न वर्ग इस विषय पर अपने-अपने विचार रखते हैं और कई स्थानों पर महिलाओं की भागीदारी भी सामान्य रूप से स्वीकार की जा रही है। इसलिए इसे सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत आस्था के संदर्भ में देखा जाता है।
जब हमारे संवाददाता ने समाजसेवी श्रीमती वर्षा जी से अब तक किए गए लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की संख्या के बारे में पूछा, तो उन्होंने अत्यंत विनम्रता और सहजता से कहा कि उन्हें सटीक आंकड़ा याद नहीं है। हालांकि, उनके अनुसार अब तक वे करीब 9,000 लावारिस शवों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर चुकी हैं।
यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि मानव सेवा और सामाजिक दायित्व के प्रति उनके समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। ऐसे समय में जब समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी रूढ़िवादी सोच और सामाजिक वर्जनाओं से बंधा हुआ है, श्रीमती वर्षा जी ने एक महिला होने के बावजूद इन सीमाओं को पीछे छोड़कर मानवता की मिसाल पेश की है।
लावारिस शवों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर वे न केवल मृतकों को गरिमामयी विदाई दे रही हैं, बल्कि समाज को यह संदेश भी दे रही हैं कि सेवा, संवेदना और मानवता का कोई लिंग नहीं होता। उन्होंने इस कार्य को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है और वर्षों से निस्वार्थ भाव से इस सेवा को निरंतर आगे बढ़ा रही हैं। उनका यह योगदान वास्तव में समाज के लिए प्रेरणास्रोत और अत्यंत सराहनीय है।
सेवा कार्य से जुड़े लोगों का कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ा संतोष यही है कि ईश्वर ने उन्हें मानव सेवा का अवसर प्रदान किया। उनका प्रयास रहता है कि प्रत्येक सेवा कार्य पूरी निष्ठा, संवेदनशीलता और समर्पण के साथ किया जाए, चाहे वह किसी जरूरतमंद की सहायता हो या फिर किसी लावारिस व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम विदाई देना।
उन्होंने कहा कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है और यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आए, तो अनेक ऐसे लोगों को सम्मानपूर्ण जीवन और सम्मानजनक विदाई मिल सकती है, जिनके साथ खड़े होने वाला कोई नहीं होता। प्रभु की कृपा और आशीर्वाद से भविष्य में भी ऐसे सेवा कार्य निरंतर जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया गया।