आमतौर पर यह धारणा रही है कि जो लोग किसी फैसले पर लंबे समय तक सोचते हैं, उनसे गलतियां होने की संभावना कम रहती है। माना जाता है कि ज्यादा सोच-विचार इंसान को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।
लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस सोच को ही पलट दिया है। अध्ययन में सामने आया है कि कई मुश्किल परिस्थितियों में जल्दी लिया गया फैसला ज्यादा सटीक और असरदार साबित हो सकता है, जबकि जरूरत से ज्यादा सोचने वाला व्यक्ति कई बार उलझकर गलत निर्णय ले बैठता है।
जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी आफ म्यूनिख और नीदरलैंड की इरास्मस यूनिवर्सिटी राटरडैम के शोधकर्ताओं ने यह दिलचस्प रिसर्च पेशेवर शतरंज खिलाडि़यों पर की। उन्होंने खिलाडि़यों की हर चाल को बारीकी से देखा और यह समझने की कोशिश की कि कौन सा खिलाड़ी कितनी देर में फैसला लेता है और उसका फैसला कितना सही साबित होता है।
इसके लिए खिलाडि़यों की चालों की तुलना आधुनिक शतरंज इंजनों से की गई, ताकि फैसलों की गुणवत्ता का सही अंदाजा लगाया जा सके।तेज व्यक्ति स्थिति को जल्दी पकड़ लेता हैरिसर्च में जो नतीजा सामने आया, उसने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया। जिन खिलाडि़यों ने कम समय में फैसले लिए, उनकी चालें ज्यादा मजबूत और प्रभावी निकलीं।
वहीं जो खिलाड़ी लंबे समय तक सोचते रहे, उनके फैसले कई बार कमजोर साबित हुए। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं कि सोचने से नुकसान होता है, बल्कि असली बात यह है कि तेज समझ रखने वाला व्यक्ति स्थिति को जल्दी पकड़ लेता है।
इंसान स्थिति देखकर लेता है सही निर्णय
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जब कोई इंसान किसी समस्या को जरूरत से ज्यादा कठिन मानने लगता है, तो उसका दिमाग उलझ जाता है।
वह बार-बार गणना करता है, हर संभावना पर सोचता है, लेकिन सही दिशा पकड़ने में पीछे रह जाता है। इसके उलट जिन लोगों की समझ और पकड़ मजबूत होती है, वे कम समय में ही सही रास्ता पहचान लेते हैं।
शोधकर्ता उवे जुंडे के मुताबिक इंसान और मशीन में यही सबसे बड़ा फर्क है। मशीन हर चीज को गणना से समझती है, लेकिन इंसान कई बार केवल स्थिति देखकर ही समझ जाता है कि कौन-सा फैसला सही होगा।
अगर कोई व्यक्ति शुरुआत में ही स्थिति को समझ नहीं पाता, तो बाद में उसके लिए सही निर्णय तक पहुंचना और मुश्किल हो जाता है।
देर तक सोचने वाला सबसे समझदार हो, जरूरी नहीं
यह रिसर्च केवल शतरंज की दुनिया तक सीमित नहीं मानी जा रही। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर रोजमर्रा की ¨जदगी, व्यापार, नौकरी और बड़े रणनीतिक फैसलों में भी देखा जा सकता है।
यानी हर बार देर तक सोचने वाला ही सबसे समझदार हो, यह जरूरी नहीं। कई बार असली समझ उसी में होती है, जो सही समय पर बिना उलझे सही फैसला लेना जानता हो।