‘सुनवाई से पहले किसी को सजा के तौर पर हिरासत में नहीं रख सकते’, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला…

किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित होने और मुकदमे में फैसला आने से पहले उसकी हिरासत को सजा के रूप में जारी नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि खासकर तब, जब मुकदमा जल्द शुरू होने या निकट भविष्य में खत्म होने की कोई उचित संभावना न हो, लंबे समय तक हिरासत में रखना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सवाल उठाता है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राजस्थान के सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े 2024 के मामले में दो आरोपितों को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का स्थापित सिद्धांत है कि मुकदमे से पहले की हिरासत को सजा के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यदि किसी मुकदमे का निपटारा निकट भविष्य में उचित रूप से संभव नहीं है तो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की कार्यवाही अभी शुरुआती चरण में है। आरोपों को साबित करने के लिए बड़ी मात्रा में साक्ष्य पेश किए जाने हैं, इसलिए मुकदमा लंबा चलने की संभावना है।

पीठ ने संजय बडाया और शुभांशु दीक्षित की अलग-अलग याचिकाओं पर यह आदेश दिया। दोनों ने राजस्थान हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों आरोपितों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभियोजन का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित है।

अदालत ने कहा कि इन साक्ष्यों से छेड़छाड़ की गुंजाइश नहीं है, इसलिए दोनों को जमानत देने में कोई हर्ज नहीं है।

पीठ ने यह भी ध्यान में रखा कि मामले के कुछ सह-आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इनमें पीएचईडी मंत्री महेश चंद्र जोशी भी शामिल हैं, जिन्हें पीएमएलए मामले में जमानत मिल चुकी है।

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