ऊर्जा संकट के दौर में नई उम्मीद, LPG के सस्ते और प्रदूषण-मुक्त विकल्प ‘DME’ का विकास; बिना सिलिंडर-बर्नर बदले होगा इस्तेमाल…

भारत आज तरक्की की नई ऊंचाइयों को छू रहा है। तेजी से बढ़ता औद्योगिक क्षेत्र और रफ्तार पकड़ता शहरीकरण देश की समृद्धि की कहानी लिख रहे हैं।

लेकिन, विकास की इस चमक के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है। बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और सीमाई तनावों के बीच भारत पर साइबर हमलों और सीबीआरएन (केमिकल, बायोलाजिकल, रेडियोलाजिकल और न्यूक्लियर) खतरों का जोखिम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।

नई दिल्ली में आयोजित ‘पीएचडीसीसीआई’ सम्मेलन में जारी ‘सीबीआरएन रक्षा उपायों की रिपोर्ट’ ने इन उभरते खतरों को लेकर देश को आगाह किया है।

रिपोर्ट में सीबीआरएन सुरक्षा रणनीति को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया है। यह रिपोर्ट साफ तौर पर चेतावनी देती है कि सीबीआरएन खतरों का स्वरूप अब बदल चुका है। आज के दौर में यह बेहद गतिशील और पूरी तरह से तकनीक से लैस हो चुका है।

भारत को साइबर और CBRN खतरों से सतर्क रहने की चेतावनी

यूक्रेन संघर्ष का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे आम औद्योगिक रसायनों को भी घातक हथियारों में बदलकर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऐसे में भारत को ड्रोन से फैलने वाले रसायनों और नए दौर के खतरों से निपटने के लिए अपनी रक्षा प्रणालियों और रणनीतियों को तुरंत अपग्रेड करना होगा। राहत की बात यह है कि भारतीय उद्योगों के पास विश्व स्तरीय सीबीआरएन डिटेक्शन सिस्टम, सुरक्षा उपकरण, रोबोटिक्स और एआइ-आधारित विश्लेषण उपकरण विकसित करने की पूरी क्षमता है।

जरूरत बस इस बात की है कि सरकार और उद्योग जगत के बीच एक दीर्घकालिक, स्पष्ट और मजबूत साझेदारी बने ताकि इस स्वदेशी ताकत का सही इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किया जा सके।

इस संवेदनशीलता को रेखांकित करते हुए नेशनल अथारिटी केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (एनएसीडब्ल्यूसी) की अध्यक्ष रोली ¨सह ने एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आज हमारा औद्योगिक ढांचा तेजी से आइटी और डिजिटल प्रणालियों पर निर्भर हो रहा है।

ऐसे में सीबीआरएन बुनियादी ढांचे और साइबर सुरक्षा का आपस में जुड़ना बेहद जरूरी है। यदि कोई साइबर हमला संवेदनशील औद्योगिक प्रणालियों को निशाना बनाता है, तो इससे देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में भारी तबाही और बड़े औद्योगिक हादसे हो सकते हैं।

चूंकि खतरनाक रसायनों और जैविक सामग्रियों से जुड़े बुनियादी ढांचे का एक बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों द्वारा संचालित होता है, इसलिए सुरक्षा की पहली दीवार भी फैक्टि्रयों के स्तर पर ही खड़ी करनी होगी।

सरकार जहां नियम और समन्वय की जिम्मेदारी निभाएगी, वहीं उद्योगों को अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और नवाचार के साथ आगे आना होगा। समय की मांग है कि हम आपसी सहयोग से एक ऐसा अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार करें, जो भारत के भविष्य को सुरक्षित रख सके।

आज के दौर में युद्ध अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं

डीआरडीओ विज्ञानी रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वरिष्ठ विज्ञानी उपेंद्र कुमार  ने कहा कि आज संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर आम सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है। नाटो जैसे संगठन भी तनाव में हैं, और वैश्विक संधियां व नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं।

आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है; विरोधी को कमजोर करने के लिए व्यापार, संस्कृति, पहचान और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सैन्य शक्ति अब आर्थिक और साफ्ट पावर से पूरी तरह जुड़ चुकी है। उन्होंने आशंका जताई कि भारी तनाव के चलते कुछ देश सामूहिक विनाश के हथियारों पर अपना नियंत्रण खो सकते हैं।

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