नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने रविवार को स्पष्ट किया कि उनकी सरकार ने भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के लिए ब्रिटेन से मध्यस्थता की मांग नहीं की थी। उनके इस संबंध में एक बयान पर पिछले महीने विवाद खड़ा हो गया था।
बालेंद्र शाह ने चितवन जिले में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की पहली आमसभा को संबोधित करते हुए कहा, “हमने कहा था कि अगर ब्रिटिश शासन (भारत में) के समय के सुबूतों की जरूरत पड़ी, तो हम उन्हें पेश करेंगे।
हमने उनकी मध्यस्थता की मांग नहीं की थी।
हमारे पास इस बात के सुबूत हैं कि कालापानी और लिपुलेख हमारे क्षेत्र का हिस्सा हैं। अगर उनके (भारत के) पास सुबूत हैं, तो वे भी दिखा सकते हैं।”
उन्होंने अपने विरोधियों से कहा, “हम अपने पड़ोसी के साथ बातचीत करके इस मुद्दे को सुलझा लेंगे; इसके बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।”
क्या है मामला?
प्रधानमंत्री ने लोगों से यह भी कहा कि वे राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर संदेह न करें। बालेंद्र शाह ने पिछले महीने संसद में कहा था कि नेपाल ने अलग-अलग जगहों पर भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा किया है और उसने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए चीन व ब्रिटेन को शामिल किया है, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हो गया था।
भारत ने इस विवाद को सुलझाने में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को साफ तौर पर खारिज कर दिया था। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बाद में कहा था कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी दोनों देशों के बीच ‘नो-मैंस लैंड’ और सीमापार कब्जे से संबंधित थी।
नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना विवाद है। दोनों देश इन इलाकों पर अपना दावा करते हैं। भारत का कहना है कि ये इलाके उत्तराखंड का हिस्सा हैं।