भारत-इटली संबंधों के सलाहकार और वरिष्ठ विश्लेषक कार्लो लोंबार्डी ने कहा है कि भारत में विदेशी फंडिंग पर नियम कोई नई घटना नहीं है।
विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय लागू किया गया था। उस समय देश में आपातकाल लगा हुआ था। बाद में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के दौरान इस कानून को और सख्त कर दिया गया था।
एक विशेष भेंट में लोंबार्डी ने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) मानवीय कार्यों में सकारात्मक योगदान देते हैं। लेकिन, वे अक्सर विदेश नीति के साधन के तौर पर भी काम कर सकते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग पर सरकारी निगरानी जरूरी है।
हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि दुनियाभर में फैल रही तकनीक की वजह से इस तरह का असर डालना बहुत आसान हो गया है। आर्थिक खुलापन कई चैनलों के माध्यम से फंड ट्रांसफर करने की सुविधा भी देता है, जो पहले मौजूद नहीं था। ऐतिहासिक नजरिये से देखें तो इसमें असल में कुछ भी नया नहीं है।
विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता पर जोर देते हुए लोंबार्डी ने कहा कि संप्रभु सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विदेशी धन का इस्तेमाल केवल उसके घोषित उद्देश्यों के लिए किया जाए, न कि राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए।
सरकार को पता होना चाहिए कि कौन, किसे और किस मकसद से फंड दे रहा है। सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि विदेशी पैसे का गलत इस्तेमाल न हो।