स्कूली शिक्षा को लेकर मोहन भागवत की राय, पाठ्यपुस्तकों में देवी-देवताओं की जानकारी शामिल करने का सुझाव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने नई दिल्ली में ‘युगानुकूल मातृत्व’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शिक्षा, बच्चों की परवरिश और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विचार साझा किए हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदू देवी-देवताओं से जुड़ा ज्ञान शुरुआती दौर से ही स्कूली पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी आस्था को गहराई से समझ सके।

बच्चों के तीखे सवालों व इंटरनेट मीडिया के दौर में जरूरी है संवाद भागवत ने बताया कि आज के समय में बच्चे अक्सर देवी-देवताओं के स्वरूप को लेकर असहज करने वाले या जिज्ञासु सवाल पूछते हैं – जैसे कि किसी देवता का मुख वानर या हाथी का क्यों है? अक्सर माता-पिता इन सवालों के जवाब देने में असमर्थ होते हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों के शुरुआती 12 साल उनका संस्कारों का दौर होता है, इसलिए यह ज्ञान किताबों में आसानी से उपलब्ध होना चाहिए।

वर्तमान समय की बदलती परिस्थितियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले की तरह बच्चों पर अपनी बात थोपी नहीं जा सकती। आज के बच्चे भौतिकवादी प्रभावों और इंटरनेट मीडिया की दुनिया में बड़े हो रहे हैं।

ऐसे में माता-पिता को तानाशाही रवैया अपनाने के बजाय बच्चों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए, उन्हें समय देना चाहिए और प्यार से समझाना चाहिए।

उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि असफलता के दौर में बच्चों की आलोचना करने की बजाय उन्हें भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है। मूल्य केवल भाषण देने से नहीं, बल्कि स्नेह, बातचीत और माता-पिता एवं बुजुर्गों के व्यक्तिगत उदाहरणों के माध्यम से हस्तांतरित होते हैं।

यदि यह आधार मजबूत है, तो बच्चों के लिए तकनीक के जाल से बाहर निकलना बहुत आसान हो जाता है। पुरुषों को भी घरेलू कार्यों में सक्रिय रूप से हाथ बंटाना चाहिए कार्यक्रम के दौरान एक प्रश्नोत्तर सत्र में महिलाओं की स्थिति और पारिवारिक सहभागिता पर अपने विचार साझा करते हुए आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए महिलाओं पर सभी जिम्मेदारियां नहीं लाद दी जानी चाहिए क्योंकि वे हर कार्य करने में सक्षम हैं।

परिवार को एक टीम के रूप में काम करना चाहिए और पुरुषों को भी घरेलू कार्यों में सक्रिय रूप से हाथ बंटाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि परिवार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अत्यधिक जिम्मेदारियों के बोझ तले महिलाओं की अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाएं और सपने दबकर दम न तोड़ें।

समाज और परिवार का यह दायित्व है कि वे ऐसा वातावरण तैयार करें जहां महिलाओं को न केवल समान आदर मिले, बल्कि उन्हें अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उचित अवसर और प्रोत्साहन भी प्राप्त हो। आधुनिक परिवार व्यवस्था में संतुलन, संवाद और आपसी सहयोग ही एक सुसंस्कृत समाज की नींव है।

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