सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में दर्ज एफआईआर को निराधार बताने के मामलों को निरस्त करने के आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने एफआईआर को रद करने के लिए ‘अनुचित प्रयास’ किए।
हाई कोर्ट का दृष्टिकोण ‘न्याय का मजाक’ था और इसे एफआइआर या इन मामलों में चल रही जांच के खिलाफ और कोई चुनौती स्वीकार नहीं करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को किया रद
जस्टिस एमएम सुंदरेश व जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने गुरुवार को कहा कि उच्च न्यायालय ने केवल पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र के मुद्दे पर यह प्रक्रिया अपनाई थी, जिसने एफआइआर दर्ज की थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) और अन्य द्वारा दायर अपीलों पर अपना निर्णय सुनाया, जो पिछले वर्ष अगस्त में उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती दे रही थीं।
पीठ ने कहा कि यह उन मामलों के सेट से संबंधित है जहां भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआइआर को रद किया गया था, जिससे कुछ मामलों में जांच को शुरू होने से पहले ही समाप्त कर दिया गया, जबकि अन्य में आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई थी।
सर्वोच्च अदालत ने इसे ‘न्याय का मजाक’ बताया
पीठ ने कहा, ‘हमारे विचार में उच्च न्यायालय का ²ष्टिकोण न्याय का मजाक है। यदि अत्यधिक तकनीकी आधार पर एफआइआर को रद किया जाता है, तो उच्च न्यायालय को उस अधिकार क्षेत्र के संबंध में कानून स्थापित करने की जिम्मेदारी है जो अन्यथा मौजूद है।’
सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 2(स) का उल्लेख किया, जो पुलिस थाने को परिभाषित करती है।
इसने नोट किया कि 2016 से 2020 के बीच एसीबी के विजयवाड़ा पुलिस थाने में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दंडनीय अपराधों के लिए कई एफआइआर दर्ज की गई थीं।
पीठ ने कहा कि इन एफआईआर को मुख्य रूप से इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि एसीबी, केंद्रीय अन्वेषण इकाई, आंध्र प्रदेश, विजयवाड़ा पुलिस थाने को सीआरपीसी की धारा 2(स) के तहत पुलिस थाने के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया था और इसलिए एफआइआर दर्ज करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था।