डेल कंपनी के फाउंडर और सीईओ माइकल डेल ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी जिंदगी से जुड़ा एक बहुत ही दिलचस्प किस्सा शेयर किया है।
उन्होंने अपनी कंपनी के शुरुआती दिनों का 42 साल पुराना एक फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट शेयर किया है, जिसने उनकी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी थी।
पूरी बात को ऐसे समझिए कि 42 साल पहले, माइकल डेल यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के अपने कॉलेज हॉस्टल के कमरे से कंप्यूटर अपग्रेड करने का बिजनेस चलाते थे।
जब उनके माता-पिता ने उनके बिजनेस की तरक्की और कमाई का यह पहला पन्ना देखा, तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने माइकल को कॉलेज वापस न जाने और अपने बिजनेस पर पूरा ध्यान देने की इजाजत दे दी।
डेल ने ऐसे जीता था अपन माता-पिता का विश्वास
माइकल डेल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस एक पन्ने ने मेरी जिंदगी बदल दी। आज से ठीक 42 साल पहले, इसी पन्ने ने मेरे माता-पिता को यह विश्वास दिला दिया था कि मुझे कॉलेज वापस नहीं जाना चाहिए।
डेल ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि मैंने एक हॉस्टल के कमरे से पीसी अपग्रेड करने की शुरुआत की थी और आज डेल कंपनी एज से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी एआई फैक्ट्रियों तक को पावर देने वाला बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद कर रही है।
उस ‘एक पन्ने’ में क्या था?
माइकल डेल द्वारा शेयर किए गए 31 जुलाई, 1984 को खत्म हुए तीन महीनों के स्टेटमेंट के मुताबिक उस दौरान उनकी कंपनी जो तब ‘PC’s Ltd.’ के नाम से जानी जाती थी ने महज तीन महीनों में लगभग 8.88 लाख डॉलर की कमाई की थी। इसमें से डेल का मुनाफा लगभग एक करोड़ तीस लाख रहा था।
हॉस्टल के कमरे से शुरू हुआ सफर
बता दें कि माइकल डेल ने साल 1984 में पढ़ाई के दौरान ही इसकी शुरुआत कर दी थी। शुरुआत में वे सीधे पूरा कंप्यूटर नहीं बनाते थे, बल्कि ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से पुराने कंप्यूटरों में हार्ड ड्राइव और मेमोरी बढ़ाने का काम करते थे।
हालांकि रास्ता इतना आसान भी नहीं रहा। जैसे-जैसे बिजनेस बढ़ा, माइकल डेल ने दुकानदारों और डिस्ट्रीब्यूटरों के जरिए माल बेचने के बजाय सीधे ग्राहकों को कंप्यूटर बेचने का तरीका अपनाया। इसमें ग्राहक अपनी पसंद के पार्ट्स चुनकर कंप्यूटर कस्टमाइज करवा सकते थे।
बिना गोदाम के कैसे शुरू किया बिजनेस
अच्छा गौर करने वाली बात यह भी है कि इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह था कि डेल को पहले से बहुत सारे कंप्यूटर बनाकर गोदाम में रखने की जरूरत नहीं पड़ती थी। जब ग्राहक ऑर्डर देता था, तभी कंप्यूटर तैयार किया जाता था। इससे सामान के सड़ने या पुराना होने का खर्च बच गया और कम पैसों में तेजी से मुनाफा होने लगा।
हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के अनुसार, माइकल डेल का यह कदम उस समय के पीसी मार्केट के हिसाब से क्रांतिकारी था। कम संसाधनों और एक छोटे से हॉस्टल के कमरे से शुरू हुआ यह सफर यह साबित करता है कि छोटे-छोटे फैसले और सही समय पर लिया गया जोखिम आपकी पूरी जिंदगी और दुनिया की तस्वीर बदल सकता है।
माइकल डेल ने साल 1984 में पढ़ाई के दौरान ही इसकी शुरुआत कर दी थी। शुरुआत में वे सीधे पूरा कंप्यूटर नहीं बनाते थे, बल्कि ग्राहकों की जरूरत के हिसाब से पुराने कंप्यूटरों में हार्ड ड्राइव और मेमोरी (RAM) बढ़ाने का काम करते थे।
बिचौलियों को किया बाहर (Direct-to-Consumer Model): जैसे-जैसे बिजनेस बढ़ा, माइकल डेल ने दुकानदारों और डिस्ट्रीब्यूटरों के जरिए माल बेचने के बजाय सीधे ग्राहकों को कंप्यूटर बेचने का तरीका अपनाया। इसमें ग्राहक अपनी पसंद के पार्ट्स चुनकर कंप्यूटर कस्टमाइज़ (अपने हिसाब से तैयार) करवा सकते थे।बिना गोदाम के बिजनेस (Just-in-Time Manufacturing): इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह था कि डेल को पहले से बहुत सारे कंप्यूटर बनाकर गोदाम में रखने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
जब ग्राहक ऑर्डर देता था, तभी कंप्यूटर तैयार किया जाता था। इससे सामान के सड़ने या पुराना होने का खर्च बच गया और कम पैसों में तेजी से मुनाफा होने लगा।इससे क्या सीख मिलती है?हार्वर्ड बिजनेस स्कूल (Harvard Business School) के अनुसार, माइकल डेल का यह कदम उस समय के पीसी मार्केट के हिसाब से क्रांतिकारी था। कम संसाधनों और एक छोटे से हॉस्टल के कमरे से शुरू हुआ यह सफर यह साबित करता है कि छोटे-छोटे फैसले और सही समय पर लिया गया जोखिम आपकी पूरी जिंदगी और दुनिया की तस्वीर बदल सकता है।