रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व पीठासीन सदस्य सोनल कुमार गुप्ता ने कहा है कि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य उनके समग्र विकास, शैक्षणिक सफलता और स्वस्थ सामाजिक संबंधों की मजबूत नींव है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चे का मानसिक रूप से स्वस्थ होना उतना ही आवश्यक है, जितना उसका शारीरिक रूप से स्वस्थ होना। चाहे बच्चा किसी भी परिवार या सामाजिक वर्ग से संबंधित हो, उसके सर्वांगीण विकास के लिए बेहतर मानसिक स्वास्थ्य अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ता शैक्षणिक दबाव, अत्यधिक स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया का प्रभाव तथा पारिवारिक तनाव जैसी चुनौतियां बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों और समाज की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें और उन्हें सकारात्मक एवं सहयोगात्मक वातावरण उपलब्ध कराएं।
मानसिक स्वास्थ्य का महत्व
सोनल कुमार गुप्ता ने बताया कि स्वस्थ मानसिक स्थिति बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने, तनाव का प्रभावी ढंग से सामना करने तथा सकारात्मक एवं संतुलित निर्णय लेने में सक्षम बनाती है। इसके विपरीत मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने पर बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी, आत्मविश्वास में गिरावट और व्यवहार संबंधी समस्याएं विकसित हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों की सोच और व्यवहार में तेजी से बदलाव आ रहा है। उचित मार्गदर्शन के अभाव में उनके मुख्यधारा से भटकने की आशंका भी बढ़ जाती है।
मानसिक समस्याओं के प्रमुख संकेत
उन्होंने बताया कि यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक परिवर्तन दिखाई दे, वह बिना किसी स्पष्ट कारण के उदास रहने लगे या छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगे, परिवार एवं मित्रों से दूरी बनाने लगे, दैनिक गतिविधियों में रुचि कम हो जाए, बार-बार सिरदर्द या पेट दर्द जैसी शारीरिक शिकायतें करे अथवा पढ़ाई में ध्यान न लगने के कारण उसके शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट आने लगे, तो इसे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी संभावित समस्या का संकेत माना जाना चाहिए।
अभिभावकों की भूमिका सबसे अहम
सोनल कुमार गुप्ता ने कहा कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों के साथ नियमित संवाद बनाए रखने, स्नेहपूर्ण और विश्वासपूर्ण संबंध स्थापित करने तथा उन्हें बिना किसी भय के अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक बच्चा अपनी क्षमताओं, व्यक्तित्व और रुचियों में अलग होता है। इसलिए उसकी तुलना किसी अन्य बच्चे से नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे बच्चों में हीन भावना विकसित हो सकती है और उनके आत्मविश्वास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इसके साथ ही उन्होंने बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने की सलाह देते हुए कहा कि डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग मानसिक थकान और तनाव को बढ़ाता है। बच्चों को आउटडोर खेल, शारीरिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि बचपन और विशेष रूप से किशोरावस्था से ही बच्चों को योग, ध्यान (मेडिटेशन) और अध्यात्म से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। इससे उनके विचारों में स्थिरता, सकारात्मकता और गहराई आती है, साथ ही वे जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक आत्मविश्वास और संतुलित मानसिकता के साथ कर पाते हैं।