40 साल पुराने हत्या मामले में दो आरोपियों को मिली उम्रकैद की सजा रद्द, हाई कोर्ट ने कहा-पुख्ता सबूत नहीं थे…

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शाहजहांपुर में 40 साल पहले हुई हत्या मामले में दो अभियुक्तों की उम्रकैद यह कहते हुए रद कर दी है कि विवेचना एकतरफा की गई थी।

कोर्ट ने अभियुक्तों को अपराध से बरी करते हुए कहा है कि जांच अधिकारी ने सुबूतों को नजरअंदाज किया और केवल शिकायतकर्ता के बयान पर भरोसा किया, जबकि उसमे कई विसंगतियां थीं और अभियुक्त के खिलाफ कोई ठोस सुबूत नहीं था।

यह आदेश न्यायमूर्ति चन्द्रधारी सिंह व न्यायमूर्ति देवेन्द्र सिंह (प्रथम) की खंडपीठ ने दिया है।रामू व अन्य की आपराधिक अपील में 29 अप्रैल 1987 को सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय व आदेश को चुनौती दी गई थी।

इसमें अभियुक्तों को आइपीसी की धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास व धारा 323/34 के तहत छह महीने की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। अपील लंबित रहने के दौरान रामू व मिसरी की मृत्यु हो गई। इसलिए, जमानत पर चल रहे दो अन्य अभियुक्तों चेतराम तथा रामेश्वर की अपील की सुनवाई हुई।

1986 में लिखवाई गई थी एफआईआर

अभियोजन कथानक यह है कि 19 अगस्त 1986 को वादी भिखारी लाल ने खुदागंज पुलिस स्टेशन में घटना की रिपोर्ट लिखाई थी। इसमें कहा था कि राजपाल और बाबूराम पिछले पांच-छह वर्षों से उसके गांव बारौरा में रहने लगे थे। राजपाल ने रामेश्वर को 220 रुपये कर्ज दिया था।

ब्याज के बदले रामेश्वर ने राजपाल को खेत दिया था। यह तय हुआ था जब रामेश्वर पैसे चुका देगा तो राजपाल खेत मुक्त कर देगा, लेकिन रामेश्वर ने कर्ज चुकाए बिना खेत पर कब्जा कर लिया।

राजपाल ने पैसे मांगे तो 18 अगस्त की रात आठ बजे रामेश्वर, चेतराम, रामू और मिसरी लाठियों से लैस होकर राजपाल के दरवाजे पर पहुंचे और उसकी पिटाई करने लगे। बाबूराम और उसकी पत्नी सोमवती घर में थे।

वादी मुकदमा के अनुसार उसने बाबूराम के साथ राजपाल को बचाने की कोशिश की। आत्मरक्षा में लाठियां चलाईं। इससे अभियुक्तों को भी चोटें आईं और वह राजपाल को मृत समझ भाग गए। बैलगाड़ी पर लाद कर अस्पताल ले जाते समय राजपाल की रास्ते में मौत हो गई।

बारिश के कारण घटना वाले दिन ही रिपोर्ट नहीं लिखाई जा सकी। अभियुक्तों के अधिवक्ता ने कहा कि आत्मरक्षा में लाठियां चलाई गईं और जांच एकतरफा की गई है। अभियुक्तों, रामेश्वर व मिसरी ने रात 12 बजे ही घटना की रिपोर्ट लिखा दी थी।

खंडपीठ ने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्तों की चोटों पर भी विचार नहीं किया है। अभियोजन की व्याख्या को स्वीकार करना कठिन है, क्योंकि प्रथम सूचनादाता सात किलोमीटर की दूरी सात घंटे में तय नहीं कर सका था, जबकि अभियुक्तों ने घटना के सवा चार घंटे में ही रिपोर्ट दर्ज करा दी थी।’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *