मिडिल ईस्ट की जंग का आज 27वां दिन है।
इस बीच गुरुवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ईरान को फाइनल अल्टीमेटम दे दिया है। अब अमेरिका, ईरान के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की तैयारी में नजर आ रहा है।
Axios की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ‘गेट सीरियस’ वाले अल्टीमेटम के बीच पेंटागन ‘फाइनल ब्लो’ के विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिसमें बड़े पैमाने पर बमबारी या ईरान के अंदर जोखिम भरे ग्राउंड ऑपरेशन शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्लान मिडिल ईस्ट में फैलते युद्ध, स्टाल्ड कूटनीति और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के कब्जे के बाद आई है।
ईरान को कैसे करें कंट्रोल?
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ईरान को मजबूत सैन्य दबाव देकर या तो बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है या फिर जीत घोषित की जा सकती है। मुख्य टारगेट हॉर्मुज जलडमरूमध्य है, जिसे ईरान ने अपने कंट्रोल में रखा है। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
प्रस्तावित विकल्पों में खार्ग द्वीप (ईरान का प्रमुख तेल निर्यात केंद्र) पर कब्जा या ब्लॉकेड, लारक और अबू मूसा जैसे द्वीपों पर कंट्रोल, या जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से में ईरानी तेल टैंकरों को रोकना शामिल है।
सबसे जोखिम भरा प्लान
इस मिशन में सबसे जोखोम भरा काम ईरान के यूरेनियम वाले किलेबंद परमाणु सुविधाओं में घुसकर सामग्री जब्त करना है। वैकल्पिक रूप से बड़े पैमाने पर एयर स्ट्राइक्स से इन ठिकानों को नष्ट करने की योजना है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि फिलहाल अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन व्हाइट हाउस ने ग्राउंड ऑपरेशन को हाइपोथेटिकल बताया है।
ट्रंप बैक चैनल वार्ता विफल होने पर तेज एस्केलेशन के लिए तैयार हैं। इसलिए क्षेत्र में सैन्य ताकत बढ़ाई जा रही है। अतिरिक्त फाइटर जेट स्क्वाड्रन, मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट्स और हजारों सैनिकों (82वीं एयरबोर्न डिवीजन सहित) को तैनात किया गया है।
व्हाइट हाउस ने क्या कहा?
व्हाइट हाउस प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने कहा, ‘राष्ट्रपति पहले से कहीं ज्यादा जोरदार हमला करने को तैयार हैं। इसके बाद कोई भी हिंसा ईरानी शासन की वजह से होगी, जो डील करने से इनकार कर रहा है।’
इससे पहले ईरान ने अमेरिका के सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ईरानी क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिश करेगा तो जवाबी कार्रवाई होगी। पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देशों की मध्यस्थता भी असफल रही है।