झारखंड में इस बार का राज्यसभा चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं है।
यह प्रतिष्ठा, प्रबंधन और धनबल की सबसे बड़ी परीक्षा भी बन गया है। राज्य गठन के बाद हुए अधिकांश राज्यसभा चुनावों में खरीद-फरोख्त और सौदेबाजी के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन चर्चा है कि इस बार का चुनाव अब तक का सबसे महंगा साबित हो सकता है। कारण है हार्स ट्रेडिंग।
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों में पहली सीट पर लडाई नहीं है, लेकिन दूसरी सीट पर मुकाबला कांग्रेस के प्रणव झा और भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी के बीच है।
भाजपा ने पहले दिल्ली से रांची तक गंभीर विमर्श के बाद अर्थशास्त्री प्रो. गौरव वल्लभ को प्रत्याशी बनाने की तैयारी की थी। देर रात तक उन्हें सिंबल भी सौंप दिया गया। सोमवार सुबह 11 बजे नामांकन दाखिल करने का समय भी तय था।
भाजपा को भरोसा था कि गौरव की बौद्धिक छवि, विभिन्न दलों के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध और उनकी स्वीकार्यता अतिरिक्त वोट जुटाने में मदद करेगी।मगर जैसे-जैसे विधायकों की मंशा सामने आने लगी, भाजपा नेतृत्व की चिंता बढ़ती गई।
एनडीए के पास जीत के लिए जरूरी संख्या से चार वोट कम हैं। ऐसे में यदि कोई संसाधन-संपन्न निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में उतरता तो क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाता। भाजपा को यह भी एहसास होने लगा कि दूसरे खेमे में सेंधमारी की बात तो दूर, अपने सभी वोटों को एकजुट रखना भी आसान नहीं होगा।
इसी दौरान दो प्रभावशाली नाम आए। पूर्व सांसद विजय साई रेड्डी और उद्योगपति परिमल नाथवानी का। इसके बाद विधायकों के बीच सौदेबाजी की चर्चाएं तेज हो गईं। सूत्र का दावा है कि हॉर्स ट्रेडिंग में करोड़ों खर्च हो सकते हैं।
भाजपा ने परिमल नाथवानी को दिया समर्थन
भाजपा को लगा कि यदि मुकाबला धनबल की ओर बढ़ता है तो प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ेगी। फिर तो सहयोगी दलों के साथ अपने विधायकों को भी एकजुट रखना कठिन हो जाएा। लिहाजा भाजपा ने अंतिम समय में गौरव वल्लभ के स्थान पर परिमल नाथवानी को समर्थन देने का निर्णय लिया।
माना गया कि नाथवानी ही संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। अब दोनों खेमों की बड़ी चुनौती विरोधी दलों में सेंध लगाने से ज्यादा अपने वोटों को सुरक्षित रखना है। कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की जीत की संभावना तभी मजबूत होगी जब महागठबंधन के सभी विधायक एकजुट रहेंगे। लेकिन नाथवानी के मैदान में आने के बाद यह काम आसान नहीं दिख रहा।
कांग्रेस, राजद और माले के कुछ विधायक दोनों पक्षों के संपर्क में बताए जा रहे हैं। इसी डर से कांग्रेस अपने विधायकों को तेलंगाना ले जाने की तैयारी कर रही है। उद्देश्य एकजुट रखकर टूट-फूट से बचाना है। हालांकि यह क्रास वोटिंग रोकने की गारंटी नहीं है, क्योंकि मतदान के लिए सभी विधायकों को रांची ही लौटना होगा।
ऐसे में पूरा दारोमदार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की प्रबंधन क्षमता पर टिक गया है। यदि वह सफल हो जाते हैं तो इसे उनकी बड़ी सफलता माना जाएगा और यदि नाथवानी जीत जाते हैं तो इसे भाजपा के चुनावी प्रबंधन की जीत के रूप में देखा जाएगा।