‘वैवाहिक विवादों में पूरे ससुराल पक्ष को आरोपी बनाना गलत’, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी…

वैवाहिक रिश्तों का टूटना और बिखरना केवल दो दिलों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का टूटना होता है।

जब एक शादी असफल होती है, तो उसके मलबे से अक्सर गुस्सा, हताशा और कड़वाहट जैसी भावनाएं जन्म लेती हैं। इसी मानवीय त्रासदी और कानूनी दुरुपयोग के बीच संतुलन बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

इसने साफ कहा है कि किसी वैवाहिक विवाद में महज सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के हर रिश्तेदार के खिलाफ आपराधिक कानून का चक्रव्यूह नहीं रचा जा सकता। ऐसे विवादों में पूरे ससुराल पक्ष को घसीटना गलत है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मध्य प्रदेश में 2023 में वैवाहिक विवाद में फंसे एक व्यक्ति के परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और घरेलू हिंसा के मामले को रद करते हुए यह टिप्पणी की।

कोर्ट ने माना कि जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, तो गुस्से और भावनात्मक तनाव में आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।

कानून उत्पीड़न का हथियार न बने

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक असफल विवाह में पीड़ित महिला के दर्द और उसकी पीड़ा को कमतर नहीं आंका जा सकता, लेकिन साथ ही आपराधिक कानून को व्यक्तिगत प्रतिशोध या पारिवारिक हिसाब चुकता करने का जरिया बनने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती।

कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि बिना किसी ठोस तथ्यात्मक आधार के आपराधिक कानून की सख्ती को परिवार के हर सदस्य पर अंधाधुंध तरीके से लागू न किया जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि रिश्तेदारों के खिलाफ प्रत्येक आरोप विशिष्ट, स्पष्ट और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों द्वारा समर्थित होने चाहिए।

महज यह आरोप कि परिवार के सदस्यों ने ‘पति का समर्थन किया’, ‘बीच-बचाव नहीं किया’ या महिला को ‘ससुराल में तालमेल बिठाने की सलाह दी’, किसी को अपराधी बनाने के लिए काफी नहीं है। बिना किसी ठोस भागीदारी के सिर्फ रिश्तेदार होने के नाते किसी को आपराधिक मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।

वास्तविक पीड़ितों की सुरक्षा भी जरूरी

कोर्ट ने सिक्के के दूसरे पहलू को भी उतनी ही संवेदनशीलता से छुआ। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि भारत में आज भी बंद कमरों के भीतर महिलाएं गंभीर क्रूरता, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। अक्सर ऐसी घटनाओं के स्वतंत्र गवाह या पुख्ता सबूत तुरंत उपलब्ध नहीं होते, और शुरुआत में सबूतों की कमी मात्र से पीड़िता को झूठा नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने साफ किया कि इस फैसले का मतलब यह कतई नहीं है कि पति के रिश्तेदारों पर कभी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अगर रिकॉर्ड पर उनके खिलाफ विशिष्ट भूमिका, सक्रिय भागीदारी या क्रूरता के सीधे सबूत मिलते हैं, तो उन्हें कानून के दायरे में आना ही होगा।

बहरहाल, मौजूदा मामले में मुख्य आरोप पति पर ही थे, और दोनों पक्षों का तलाक भी हो चुका था, इसलिए कोर्ट ने ससुराल वालों को राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट को बाकी मुख्य आरोपितों पर मामला जारी रखने का निर्देश दिया।

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