वेर्षा वर्मा (समाज सेविका – लखनऊ, उत्तरप्रदेश):
लखनऊ। शहर के डालीगंज चौराहे पर लगा एक साइन बोर्ड इन दिनों सार्वजनिक स्थलों पर प्रचार सामग्री चिपकाने की प्रवृत्ति को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। यह बोर्ड केवल सड़क की दिशा बताने वाला संकेतक नहीं, बल्कि किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक भी है। ऐसे में इस पर पोस्टर लगाए जाने से इसकी उपयोगिता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय स्तर पर सामने आई आपत्ति के अनुसार, डालीगंज चौराहे से गुलाला घाट की ओर आने-जाने वाले लोगों की नजर अक्सर इस साइन बोर्ड पर पड़ती है। आरोप है कि समय-समय पर इस बोर्ड पर अलग-अलग व्यक्तियों के प्रचार संबंधी पोस्टर और त्योहारों की शुभकामना संदेश चस्पा किए जाते रहे हैं। कभी किसी अधिकारी या व्यक्ति के नाम से प्रचार सामग्री दिखाई देती है, तो कभी होली-दिवाली की बधाइयों वाले पोस्टर नजर आते हैं। अब अग्रसेन जयंती का पोस्टर लगाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है रास्ते का संकेत
लखनऊ में KGMU एक प्रमुख चिकित्सा संस्थान है, जहां इलाज के लिए विभिन्न क्षेत्रों से मरीज पहुंचते हैं। शहर से अनजान लोगों, मरीजों के परिजनों और आपातकालीन स्थिति में अस्पताल का रास्ता तलाश रहे लोगों के लिए सड़क संकेतक बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में यदि किसी दिशा-निर्देश बोर्ड पर पोस्टर चिपका दिए जाएं और उससे जरूरी जानकारी ढक जाए, तो लोगों को परेशानी हो सकती है।
खासकर आपातकालीन परिस्थितियों में रास्ता पहचानने में होने वाली देरी मरीज के लिए गंभीर साबित हो सकती है। हालांकि, इस मामले में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि पोस्टरों से बोर्ड की कितनी जानकारी ढकी है और किसी मरीज को वास्तव में रास्ता तलाशने में परेशानी हुई है या नहीं।
प्रचार के लिए सार्वजनिक संकेतकों का इस्तेमाल क्यों?
धार्मिक आयोजनों, सामाजिक कार्यक्रमों और राजनीतिक गतिविधियों के प्रचार के लिए शहर में अनेक माध्यम उपलब्ध हैं। लेकिन सार्वजनिक साइन बोर्डों का मूल उद्देश्य नागरिकों को रास्ता और आवश्यक दिशा-निर्देश उपलब्ध कराना है। इनका इस्तेमाल निजी प्रचार या शुभकामना संदेशों के लिए किए जाने पर सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक सुविधा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मुद्दा किसी व्यक्ति, संगठन या धार्मिक आयोजन के प्रचार का विरोध करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति और नागरिकों की सुविधा को प्राथमिकता देना है। धार्मिक आस्था और सामाजिक आयोजनों का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन उनके प्रचार के लिए ऐसे स्थानों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, जिनका सीधा संबंध आम लोगों की सुरक्षा और आवागमन से हो।
नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस से कार्रवाई की मांग
इस मामले को लेकर लखनऊ नगर निगम और यातायात पुलिस से मांग की गई है कि डालीगंज चौराहे पर लगे साइन बोर्ड का निरीक्षण कराया जाए और यदि उस पर अनधिकृत पोस्टर लगाए गए हैं, तो उन्हें हटवाया जाए। साथ ही, भविष्य में सार्वजनिक दिशा-निर्देश बोर्डों पर प्रचार सामग्री चिपकाने की घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।
सवाल यह है कि जब किसी साइन बोर्ड का उद्देश्य लोगों को अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता बताना है, तो उसे प्रचार का माध्यम क्यों बनाया जाए? प्रचार के अनेक विकल्प हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक मार्गदर्शन और नागरिक सुरक्षा से जुड़े संकेतकों को उनकी मूल भूमिका में बनाए रखना जरूरी है।
आखिरकार, सार्वजनिक स्थानों पर प्रचार से अधिक महत्वपूर्ण आम नागरिकों की सुविधा, मरीजों की जरूरत और आपातकालीन सेवाओं के लिए सुगम आवागमन है। संबंधित अधिकारियों को इस शिकायत पर ध्यान देकर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।