सद्दाम के बाद इराक ढह गया, लेकिन खामेनेई-लारिजानी की हत्या से युद्ध क्यों नहीं रुका; जानें ईरान का मोजेक डिफेंस क्या है?…

साल 2003 में जब अमेरिकी सेनाओं ने इराक में सद्दाम हुसैन को मार गिराया, तो इराकी सेना लगभग रातोंरात गायब हो गई। सद्दाम का शासन एक क्लासिक ‘टॉप-डाउन’ पिरामिड संरचना था।

जिसमें शीर्ष हटा दो तो आधार को कोई निर्देश नहीं मिलेगा, यानी कोई अधिकार नहीं बचा। पूरा शासन ढह गया। लेकिन 2026 में दुनिया इसके उलट नजारा देख रही है। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी और कई वरिष्ठ कमांडरों की हत्या के बावजूद ईरान नहीं झुका।

इसके बजाय ईरान जवाबी हमले जारी रखे हुए है, युद्ध का इलाका लगातार फैला रहा है। इसकी वजह है तेहरान द्वारा दो दशकों से परिपक्व की गई रणनीति जिसे कहते हैं मोजेक डिफेंस।

नुकसान तो हुए, लेकिन शून्य नहीं हुआ 

2026 के इस संघर्ष के शुरुआती हफ्तों में इजरायल ने ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक्स’ पर जोर दिया, यानी ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य कमांड को निशाना बनाया। पहले अली खामेनेई और फिर 17 मार्च को अली लारिजानी की हत्या को निर्णायक झटका माना गया।

लारिजानी, खामेनेई की मौत के बाद सैन्य कमांडर के रूप में उभरे थे। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा, ‘यह एक साथ नहीं होगा और आसान नहीं होगा, लेकिन अगर हम दृढ़ रहें तो उन्हें अपना भाग्य खुद तय करने का मौका देंगे।’ इजरायली रक्षा मंत्री योआव गैलेंट ने इसे ‘वास्तविक नेता के खात्मे’ का नाम दिया।

लेकिन ईरानी सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने मौतों की पुष्टि करते हुए कहा कि ‘सिस्टम बरकरार है।’ विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा, ‘अमेरिका और इजरायल को अभी तक यह समझ नहीं आया कि इस्लामिक रिपब्लिक की मजबूत राजनीतिक संरचना है, जिसमें स्थापित संस्थाएं हैं। किसी एक व्यक्ति की अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता।’

प्रोटोकॉल के तहत लारिजानी की मौत के बाद उनके डिप्टी ने घंटेभर में पूरा ऑपरेशनल अधिकार संभाल लिया। युद्ध की नौकरशाही रुकी नहीं, बस अगले लेवल पर शिफ्ट हो गई।

मोजेक डिफेंस क्या है?

‘मोजेक डिफेंस’ 2000 के मध्य में आईआरजीसी कमांडर जनरल मोहम्मद अली जाफरी के समय सामने आया था। यह सिर्फ युद्धक्षेत्र की रणनीति नहीं, बल्कि अस्तित्व के खतरे में राज्य की तैयारी का सिस्टमिक रीडिजाइन है। इसमें ईरान की सैन्य और सुरक्षा व्यवस्था को विकेंद्रीकृत नेटवर्क में बदला गया।

यानी ऐसी अर्ध-स्वायत्त इकाइयां जो केंद्रीय नेतृत्व के बिना भी काम कर सकें। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि अगर दुश्मन सिर काट दे तो शरीर खुद सोचकर लड़ सके और जीवित रह सके।

आईआरजीसी को 31 प्रांतीय कमांड में बांटा गया है। प्रत्येक प्रांत मोजेक का एक ‘टाइल’ है। अगर संचार टूट जाए, तो प्रांतीय कमांडर स्थानीय ‘सुप्रीम लीडर’ बन जाता है।

उन्हें पहले से अधिकार है कि वे स्वतंत्र जवाबी हमले करें। प्रत्येक प्रांत में स्वतंत्र ईंधन, भोजन और दवा स्टॉक हैं। लाखों पड़ोस-स्तरीय पैरामिलिट्री वॉलंटियर्स ग्रासरूट पर तैयार हैं। सैटेलाइट लिंक जाम हों या बंकर नष्ट हों, पूर्व-निर्धारित युद्ध योजनाएं चलती रहती हैं।

‘हेडलेस हाइड्रा’ प्रभाव

विकेंद्रीकरण से ‘डिकैपिटेशन स्ट्राइक’ का कॉन्सेप्ट ही खत्म हो जाता है। पारंपरिक युद्ध में नेतृत्व मारने से संघर्ष खत्म होता है। मोजेक युद्ध में नेताओं की मौत ‘टाइल्स’ को अनलॉक करती है।

अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी CENTCOM अधिकारियों ने माना कि होर्मुज जलडमरूमध्य में कई ड्रोन हमले प्रांतीय इकाइयों ने स्वतंत्र रूप से किए थे।

इसमें शीर्ष कमांडर का कोई हाथ नहीं था। एक कमांडर मारने से शून्य नहीं बनता, उत्तराधिकार चेन एक्टिव होती है। नोड नष्ट होने से ऑपरेशन रुकते नहीं, जिम्मेदारी दूसरी नोड्स पर शिफ्ट होती है।

कम लागत का जाल

एक्सपर्ट्स की राय है कि ईरान पारंपरिक युद्ध जीत नहीं सकता, लेकिन संघर्ष को लंबा खींच सकता है, युद्धक्षेत्र फैला सकता है और वैश्विक लागत बढ़ा सकता है।

ईरान के सस्ते शाहेद ड्रोन (20,000-50,000 डॉलर) से बचने के लिए दुश्मन को THAAD और पैट्रियट जैसे इंटरसेप्टर पर लाखों खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके अलावा ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ जैसे ग्रुप युद्धक्षेत्र को फैलाते हैं। जिससे एक सुप्रीम लीडर की बजाय 31 कमांडर ट्रैक करने पड़ते हैं।

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