ईरान के पास बड़ा ‘ट्रंप कार्ड’! होर्मुज की रणनीतिक ताकत परमाणु हथियार से कम नहीं-तेहरान की चालों में कैसे उलझा अमेरिका?…

अमेरिका-इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया। इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई, जिसके बाद ईरान ने भी दोनों देशों को जवाब दिया, जिससे मिडिल ईस्ट में युद्ध छिड़ गया।

अमेरिका और इजरायल को दशकों से यह डर सताता रहा है कि कहीं ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर ले। इसी डर के चलते अमेरिका-इजरायल ने ईरान के खिलाफ जंग छेड़ दी।

इस युद्ध से पहले अमेरिका-इजरायल तो क्या ईरान को भी कहां पता था कि उसे किसी परमाणु हथियार को हासिल करने की जरूरत नहीं है, उसके पास पहले से ही परमाणु बॉम्ब जैसा हथियार मौजूद है।

अमेरिका-इजरायल ने क्यों किया हमला?

अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला करने का तर्क हमेशा यही दिया अगर तेहरान के पास परमाणु हथियार आ गए, तो इससे इलाके की दूसरी ताकतें जैसे सऊदी अरब, मिस्र या तुर्क भी परमाणु हथियारों की होड़ में शामिल हो सकते हैं।

एक और चिंता, जो इतनी खुलकर सामने नहीं आई, वह हमेशा से पश्चिम एशिया पर रणनीतिक नियंत्रण खोने का डर है। यानी, यह डर कि अगर ईरान परमाणु-सक्षम बन गया, तो वह इलाके में ताकत के समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा।

इसके साथ ही अगर ईरान के पास परमाणु हथियार आ गए, तो दूसरे अरब देशों के साथ पश्चिमी देशों के रिश्ते कमजोर हो जाएंगे। ऐसा होने पर, यूरोप और बाकी एशिया को जोड़ने वाला एक अहम व्यापारिक और सैनिक केंद्र उनके हाथ से निकल जाएगा।

होर्मुज बना न्यूक्लियर बॉम्ब

मिडिल ईस्ट दुनिया का एक ऐसा अस्थिर इलाका है, जहां से दुनिया को उसके कुल तेल और गैस का एक-तिहाई हिस्सा, साथ ही भारी मात्रा में खाद और दूसरा कच्चा माल मिलता है।

ईरान को हमेशा यही लगा कि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उसे परमाणु हथियारों की जरूरत है। लेकिन, जैसा कि इस युद्ध से सामने आया है कि ईरान को असल में कभी भी परमाणु हथियारों की जरूरत पड़ी ही नहीं, क्योंकि उसके पास ‘होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)’ है।

अमेरिका के साथ युद्ध के बीच ईरान के तेल के टैंकरों की आवाजाही को रोकने की कार्रवाई से यह बात साफ हो गई कि यह जलमार्ग, जिससे दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले कुल कच्चे तेल और गैस के व्यापार का 20-25 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है, भौगोलिक लिहाज से परमाणु हथियार के बराबर ही ताकतवर है।

ईरान के पास ‘ट्रंप कार्ड’

होर्मुज, फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। खास तौर पर, यह सऊदी अरब और UAE में कच्चे तेल के निर्यात टर्मिनलों को एशिया और उससे आगे के बाजारों से जोड़ता है।

एक अनुमान के मुताबिक, युद्ध से पहले इस जलमार्ग से रोजाना 20-21 मिलियन बैरल तेल यहां से गुजरता था। इसका ज्यादातर हिस्सा भारत, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान खरीदते थे। इन चारों देशों ने 2025 में अनुमानित 76 प्रतिशत तेल खरीदा और मिलकर वैश्विक GDP का 30 प्रतिशत हिस्सा बनाया।

ईरान के होर्मुज को बंद करके कच्चे तेल की आपूर्ति को ठप करने के असर ने तेजी से वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदल दिया।

ईरान ने इस युद्ध से एक बहुत अहम सबक सीखा है। एक ऐसा सबक, जो अब भविष्य के लिए उसकी सैनिक रणनीति का मुख्य आधार बन चुका है। यही वजह है कि अब वह इस जलमार्ग पर ईरान अपने अधिकार को मान्यता दिए जाने की मांग कर रहा है।

होर्मुज का यह ‘चोकपॉइंट’ इस युद्ध के खत्म हो जाने के काफी समय बाद तक भी इस इलाके की भू-राजनीति को पूरी तरह से बदलकर रख देगा। यह ईरान के हाथ में भविष्य के किसी भी टकराव या संघर्ष के लिए एक बेहद ताकतवर ‘तुरूप का इक्का’ है।

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