ईरान ने अमेरिका की पुरानी कमजोरी को फिर किया उजागर, 46 साल पुराने असफल मिशन की दिलाई याद; आखिर क्या था ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’?…

अमेरिकी सैन्य इतिहास की सबसे अपमानजनक हार में से एक की 46वीं वर्षगांठ पर ईरान के न्यायिक प्रमुख घोलम-हुसैन मोहसेनी-एजेई ने शनिवार को संयुक्त राज्य अमेरिका को चेतावनी दी कि अगर फारसी खाड़ी में तनाव बढ़ता है तो “इस्फहान और तबस” जैसी घटनाएं फिर से दोहराई जा सकती हैं।

उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “अमेरिकियों को पता होना चाहिए कि उनके पास ईरान पर नौसैनिक नाकाबंदी लगाने की क्षमता भी नहीं है। फारसी खाड़ी के पानी में इस्फहान और तबस की घटनाएं एक बार फिर दोहराई जाएंगी।”

‘अमेरिका की अपमानजनक हार अलग ही महक रखती है’

ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने तबस के प्रतीकात्मक महत्व पर प्रकाश डाला। पोस्ट में आगे कहा गया, “ऑर्दिबेहेश्त की पांच तारीख, जो तबस में अमेरिकी सेना की अपमानजनक हार की वर्षगांठ है आज इस्लामी ईरान के लोगों के लिए एक अलग ही रंग और महक रखती है।”

उन्होंने हालिया झड़पों का भी जिक्र किया और दावा किया कि ईरानी सेना ने अमेरिका से जुड़ी सेनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। उनकी पोस्ट में आगे लिखा था, “हालिया युद्ध में उस नीच दुश्मन की कमांडो सेनाओं को इस बार इस्फहान में ही रोक दिया गया और उन्हें इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सशस्त्र सेनाओं के हाथों एक करारी और सबक सिखाने वाली हार का सामना करना पड़ा।”

ये टिप्पणियां होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री अभियानों को लेकर तेहरान और वाशिंगटन के बीच बढ़ते तनाव के बीच आई हैं, जहां दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आक्रामक कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। इसमें नौसैनिक रुकावटें और जहाजों को जब्त करना शामिल है।

ऑपरेशन ईगल क्लॉ क्या था?

तबास का जिक्र ऑपरेशन ईगल क्लॉ से जुड़ा है। यह अमेरिका का एक नाकाम सैन्य मिशन था, जिसे अप्रैल 1980 में जिमी कार्टर के राष्ट्रपति रहते हुए अंजाम दिया गया था।

यह ऑपरेशन ईरान बंधक संकट के दौरान शुरू किया गया था। यह संकट तब पैदा हुआ, जब नवंबर 1979 में ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और दर्जनों अमेरिकियों को बंधक बना लिया।

महीनों तक चली नाकाम बातचीत के बाद कार्टर ने एक पेचीदा बचाव योजना को मंजूरी दी। इस योजना में अमेरिकी सेना की कई शाखाएं शामिल थीं।

इस मिशन को दो रातों में पूरा होने वाले एक बहु-चरण ऑपरेशन के तौर पर डिजाइन किया गया था। इसमें वायु सेना के C-130 ट्रांसपोर्ट विमान और नौसेना के RH-53D हेलीकॉप्टर शामिल थे।

पहली रात को डेल्टा फोर्स के कमांडो को ले जा रहे ट्रांसपोर्ट विमानों को ‘डेजर्ट वन’ नाम की एक दूरदराज की रेगिस्तानी जगह पर उतरना था। यह जगह तेहरान से लगभग 200 मील दक्षिण-पूर्व में थी। वहां उन्हें USS निमित्ज से रवाना हुए हेलीकॉप्टरों से मिलना था।

ईंधन भरने के बाद, सैनिकों को तेहरान के और करीब ले जाया जाना था। वहां उन्हें अगली रात दूतावास पर हमला करने से पहले छिपकर इंतजार करना था।

इस योजना में दूतावास पर धावा बोलना, बंधकों को छुड़ाना और अमेरिकी सेना की अतिरिक्त टुकड़ियों की मदद से उन्हें एक सुरक्षित हवाई अड्डे के रास्ते बाहर निकालना शामिल था।

लेकिन, यह मिशन शुरू में ही गड़बड़ाने लगा। हेलिकॉप्टरों को भीषण धूल भरी आंधी (हबूब) का सामना करना पड़ा, जिससे दृश्यता में समस्या और यांत्रिक खराबी उत्पन्न हुई।

कुछ हेलिकॉप्टरों को वापस लौटना पड़ा, जबकि अन्य देर से पहुंचे या मिशन के लिए अनुपयुक्त हो गए। उपलब्ध हेलिकॉप्टरों की संख्या कम होने के कारण मिशन रद कर दिया गया।

वापसी के दौरान, एक आरएच-53डी हेलिकॉप्टर ईंधन ले जा रहे एक सी-130 विमान से टकरा गया, जिससे एक विस्फोट हुआ जिसने दोनों विमानों को नष्ट कर दिया और आठ अमेरिकी सैनिकों (पांच वायु सेना कर्मियों और तीन मरीन) की जान ले ली।

इस असफल अभियान ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया और अमेरिकी सैन्य समन्वय में प्रमुख कमजोरियों को उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप बाद में विशेष अभियान बलों में महत्वपूर्ण सुधार हुए।

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