कृषि क्षेत्र में बढ़ेगा निवेश, दोगुनी होगी आय और… किसानों के लिए क्या है पीएम मोदी की योजना?…

विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार और निवेश बढ़ाने की जरूरत है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर 4.4 प्रतिशत रही है एवं पैदावार भी रिकार्ड स्तर पर पहुंची है।

इसके बावजूद आगे की राह आसान नहीं है। किसानों की आय में स्थायी वृद्धि के साथ कृषि को मजबूत आधार देने के लिए बड़े पैमाने पर संरचनात्मक सुधार की जरूरत है, क्योंकि उत्पादकता और आय को प्रभावित करने वाली कई चुनौतियां अब भी बरकरार हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में स्पष्ट किया है कि कृषि क्षेत्र ने कठिन समय में देश की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है, मगर इसकी विकास दर अभी भी कम है।

कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार और निवेश की तत्काल आवश्यकता

कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में जो वृद्धि दिखाई देती है, उसका बड़ा हिस्सा गैर-फसली गतिविधियों से संबंधित हैं। पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे क्षेत्र किसानों की आमदनी में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

सरकार का मानना है कि विकसित भारत के लक्ष्य के लिए खेती को व्यापक सुधारों और नए सोच के साथ आगे बढ़ाना होगा। सबसे बड़ी चुनौती उत्पादकता से जुड़ी है।

देश में पैदावार बढ़ी है, लेकिन कई विकसित देशों के मुकाबले अभी भी काफी कम है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है।

आर्थिक सर्वेक्षण में माना गया है कि उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य के सहारे किसानों की आय को लंबे समय तक नहीं बढ़ाया जा सकता।

खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए लागत कम करने, बेहतर तकनीक अपनाने और बाजार से बेहतर जुड़ाव की जरूरत है।

कम उत्पादकता, उर्वरक असंतुलन, जलवायु परिवर्तन प्रमुख चुनौतियां

उर्वरकों का असंतुलित उपयोग खेती के लिए बड़ा खतरा मिट्टी की सेहत भी गंभीर ¨चता का विषय है। सर्वेक्षण में उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को खेती के लिए बड़ा खतरा बताया गया है।

नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, लेकिन मौजूदा समय में यह संतुलन बेहद बिगड़ चुका है।

यूरिया का अत्यधिक इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है। इसे सुधारने के लिए यूरिया का मूल्य बढ़ाने और संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह दी गई है।

जलवायु अनुकूल खेती अपनाने, जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने पर जोर जलवायु परिवर्तन को भी बड़ी चुनौती बताया गया है। बदलते मौसम, अनियमित बारिश और बढ़ते तापमान का असर फसलों पर पड़ रहा है।

सर्वेक्षण में खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने के लिए जलवायु अनुकूल खेती अपनाने और जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

हालांकि हाल के वर्षों में अच्छे मानसून से उपज बढ़ी है, लेकिन बारिश पर निर्भरता जोखिम भरा हो सकता है। सिंचाई की स्थिति भी असमान है।

देश के कुल सकल फसल क्षेत्र का केवल 55.8 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। चावल, गेहूं एवं गन्ना फसलों में सिंचाई सुविधाएं ठीक हैं, लेकिन तिलहन और दलहन का क्षेत्रफल कम और सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं, जो फसल विविधीकरण में अड़ंगा है।

अब भी साहूकारों से लिया जा रहा कृषि ऋण का लगभग 23.4 प्रतिशत हिस्साकृषि ऋण की तस्वीर भी संतोषजनक नहीं है। कुल कृषि ऋण का लगभग 23.4 प्रतिशत हिस्सा अब भी साहूकारों से लिया जा रहा है।

भले ही आजादी के समय यह आंकड़ा 90 प्रतिशत के आसपास था, लेकिन मौजूदा कृषि अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए यह अनुपात चिंताजनक है। हालांकि इन चुनौतियों के बीच कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं।

बागवानी, पशुधन, मत्स्य पालन से किसानों की आय में वृद्धि

बागवानी क्षेत्र कृषि मूल्य वर्धन में लगभग 33 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ उज्ज्वल पक्ष बनकर उभरा है। 2013-14 में बागवानी उत्पादन 2807 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 3677 लाख टन हो गया।

भारत विश्व का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत का योगदान देता है। फल, सब्जी और आलू उत्पादन में भी भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है।

पशुधन और मत्स्य पालन क्षेत्रों ने भी कृषि विकास को नई ताकत दी है। बीते एक दशक में पशुधन क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन में लगभग 195 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2014 से 2025 के बीच मछली उत्पादन में 140 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *